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राष्ट्रीय खेल शासन बिल 2025 का विस्तृत विश्लेषण

 


भारत में हाल ही में लोकसभा में पारित राष्ट्रीय खेल शासन बिल 2025 : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, विधायी प्रक्रिया और भारतीय खेल क्षेत्र पर प्रभाव

प्रस्तावना

भारत में खेल नीति का इतिहास अक्सर प्रशासनिक अनियमितताओं, जवाबदेही की कमी और नीति गठन में खिलाड़ियों के सीमित हस्तक्षेप की वजह से विवादों के घेरे में रहा है। बीते वर्षों में देश ने चाहे ओलंपिक, एशियाई या कॉमनवेल्थ गेम्स में भाग लिया हो, मगर खेल संगठनों में भाई-भतीजावाद, वित्तीय गड़बड़ी, और निर्णय-निर्माण में पारदर्शिता की कमी हमेशा से उठती रही है। इन्हीं चिर-स्थायी समस्याओं के समाधान के लिए अगस्त 2025 में भारतीय संसद ने राष्ट्रीय खेल शासन विधेयक, 2025 पारित किया। विशेषज्ञों के अनुसार, यह बिल भारतीय खेल प्रशासन में अबतक का सर्वाधिक मर्यादित और दूरगामी कानूनी सुधार है, जो न सिर्फ हालिया प्रशासनिक विफलताओं का निदान करता है, बल्कि भारत को एक उभरती खेल महाशक्ति के रूप में स्थापित करने का रोडमैप भी प्रस्तुत करता है

I. भारत में खेल शासन का ऐतिहासिक संदर्भ

1.1. नीति का विकास और चुनौतियाँ

स्वतंत्रता के बाद भारत में खेलों के सरकारी प्रोत्साहन की प्रक्रिया धीमी और बिखरी रही। 1950 के दशक में केंद्र सरकार द्वारा अखिल भारतीय खेल परिषद (AICS) की स्थापना की गई, जो खिलाड़ियों के लिए सहयोग और सरकारी सलाह का मुख्य केंद्र होकर भी पर्याप्त बजटीय समर्थन से वंचित रही। वर्ष 1982 में IX एशियाई खेलों के आयोजन के दौरान पहली बार खेल विभाग स्थापित हुआ और 1984 में प्रथम राष्ट्रीय खेल नीति (NSP) लागू की गई। वर्ष 2000 में खेल और युवा मामले का अलग मंत्रालय गठित हुआ

1986 में भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) की स्थापना क्रियान्वयन के उद्देश्य से की गई और 2001 तक खेल प्रशासन राज्यों की जिम्मेदारी रहता आया, जिससे निष्पादन में असमानता रही। उदारीकरण (1991) के बाद केबल टीवी, स्पॉन्सरशिप और मीडिया की वजह से खेलों की दृश्यता में काफी वृद्धि हुई, परंतु यह प्रभाव क्रिकेट तक ही सीमित रहा

महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदमों में 2011 की राष्ट्रीय खेल विकास संहिता (NSDCI) शामिल रही, लेकिन इसे भी आम सहमति और कानूनी मजबूती के अभाव में लागू नहीं किया जा सका। इसी प्रशासनिक असफलता ने न्यायालयों के निरंतर हस्तक्षेप, चुनावी विवादों तथा अस्थाई समितियों के जरिए महासंघों के संचालन को जन्म दियाप्रमुख खेल संघों में भ्रष्टाचार, चयन विवाद, और डोपिंग मामलों ने खिलाड़ियों की छवि, सरकार के विश्वास तथा भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा दोनों पर प्रतिकूल असर डाला

1.2. भारतीय खेल नीति का ढांचा

भारत का खेल शासन सरकार, भारतीय ओलंपिक संघ (IOA), राज्य ओलंपिक संघ, राष्ट्रीय खेल महासंघ (NSFs), और भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) जैसे दसियों हितधारकों की बहुस्तरीय व्यवस्था पर टिका है। दुर्भाग्य से इस ढांचे में अधिकारों एवं उत्तरदायित्व का अस्पष्ट सीमांकन, स्वायत्तता के नाम पर नियंत्रण की कमी, राजस्व प्रबंधन में अनियमितता, और खिलाड़ियों के चयन-संबंधी विवाद लगातार उठते रहे

II. राष्ट्रीय खेल शासन विधेयक 2025 : विधायी प्रक्रिया एवं नवीन अधिनियम

2.1. विधायी प्रक्रिया की मुख्य अवस्थाएँ

23 जुलाई 2025 को केंद्र सरकार ने यह विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया। 11 अगस्त को लोकसभा तथा अगले ही दिन राज्यसभा में सीमित चर्चा के साथ यह विधेयक ध्वनि मत से पारित हो गया। 18 अगस्त को राष्ट्रपति की मंजूरी के साथ ही यह विधेयक अधिनियम बन गया और इसका आधिकारिक गजट प्रकाशित हुआ। यह बिल वर्ष 2011, 2013, 2017 और 2019 के खेल विधेयकों से प्रेरित होकर अनेकों stakeholder consultations, IOA, NSFs, खिलाड़ियों, वरिष्ठ खिलाड़ियों व कानूनी विशेषज्ञों के फीडबैक से रूपांकित हुआ

2.2. विधेयक का ऐतिहासिक महत्व

अब भारत उन विशिष्ट देशों की श्रेणी में आ गया है, जहाँ खेल प्रशासन हेतु एक समग्र, विधायी और कानूनी नियंत्रण वाली व्यवस्था है– जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, चीन और जापान। इसी विधिक-प्रशासनिक सुधार की सख्त जरूरत पिछले एक दशक से महसूस हो रही थी, जब बार-बार विभिन्न खेल संघों की स्वायत्तता, मुकदमेबाजी, और खिलाड़ियों की असंतुष्टि के मामले मीडिया व अदालतों में उभरते रहे

III. विधेयक के उद्देश्य एवं प्रमुख प्रावधान

3.1. विधेयक के उद्देश्य

  • खेल संघों में पारदर्शिता और जवाबदेही लाना,

  • खिलाड़ियों की भागीदारी और अधिकार सुनिश्चित करना,

  • खेल विवादों के त्वरित एवं निष्पक्ष निपटान हेतु स्वतंत्र न्यायाधिकरण स्थापित करना,

  • प्रशासनिक सुधार और नीति-निर्माण में पेशेवराना एवं नैतिक दृष्टिकोण को प्राथमिकता देना,

  • अंतरराष्ट्रीय मानकों (IOC, FIFA, WADA) के अनुरूप भारतीय खेल निकायों और उसके संचालन को सुव्यवस्थित करना,

  • 2036 ओलंपिक मेजबानी हेतु भारत की दावेदारी मजबूत करना

3.2. विधेयक की संरचना और मुख्य प्रावधान

3.2.1. राष्ट्रीय खेल बोर्ड (NSB)

  • गठन ও अधिकार : एक स्वतंत्र, नियामक संस्था– NSB– के गठन का प्रावधान, जो सभी NSFs को नियमन, मान्यता, निलंबन/रद्दीकरण, वित्तीय निगरानी, आचार संहिता तथा चुनावों की व्यवस्था करेगा। NSB में एक अध्यक्ष व सदस्य होंगे, जिनका चयन खोज-सह-चयन समिति की सिफारिश पर केंद्र सरकार करेगी। चयन समिति में कैबिनेट सचिव/खेल सचिव, SAI के महानिदेशक, वरिष्ठ खेल प्रशासक और प्रतिष्ठित खिलाड़ी शामिल रहेंगे

  • NSB के पास किसी खेल संघ में चुनावी गड़बड़ी, वित्तीय हेराफेरी, सालाना लेखा प्रकाशन न करने या अंतरराष्ट्रीय विधियों के उल्लंघन की दशा में उस संघ की मान्यता रद्द या निलंबित करने की शक्ति है। अनुशासनात्मक कार्रवाई से पूर्व संबंधित वैश्विक संस्था से परामर्श आवश्यक है

  • NSB, एसोसिएशन के सार्वजनिक धन के दुरुपयोग की स्थिति में, स्वतः कार्रवाई कर सकता है और उसे लेखा/ऑडिट रिपोर्ट, चुनावी प्रक्रिया, और वित्तीय समता पर निगरानी का कानूनी अधिकार भी प्राप्त है

3.2.2. राष्ट्रीय खेल न्यायाधिकरण

  • संरचना: तीन सदस्यीय राष्ट्रीय खेल न्यायाधिकरण का गठन, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान/पूर्व न्यायाधीश या उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अध्यक्ष होंगे। यह बोर्ड दीवानी न्यायालय-समान शक्तिसंपन्न होगा।

  • कार्यक्षेत्र: संघों/खिलाड़ियों के चयन, चुनाव व आंतरिक विवाद एवं अनुशासन के प्रकरण में सुनवाई कर सकेगा।

  • अपील की व्यवस्था: न्यायाधिकरण के फैसले के विरुद्ध अंतिम अपील केवल सुप्रीम कोर्ट में होगी। निचली अदालतों की जगह अब यह न्यायाधिकरण खिलाड़ियों को त्वरित न्याय देगा

3.2.3. राष्ट्रीय खेल चुनाव पैनल

  • स्वतन्त्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए भारत निर्वाचन आयोग/राज्य निर्वाचन आयोग के पूर्व अधिकारी चुनाव पैनल में रहेंगे जो खेल संघों के चुनाव की निगरानी करेंगे। यह केंद्रीय पैनल सभी NSFs में निर्वाचन अधिकारी के तौर पर कार्य करेगा

3.2.4. खिलाड़ी-केंद्रित प्रतिनिधित्व और लैंगिक संतुलन

  • प्रत्येक NSF की कार्यकारी समिति में 25% पूर्व खिलाड़ी तथा सर्वोत्तम 10% संयुक्त सदस्य (voting members) अनिवार्य रूप से खिलाड़ी होंगे।

  • कम से कम 33% महिला प्रतिनिधित्व अनिवार्य, जिससे लैंगिक विविधता, सुरक्षा और महिला खिलाड़ियों के सशक्तिकरण को बल मिलेगा

  • प्रमुख पदों– अध्यक्ष, महासचिव, कोषाध्यक्ष– के लिए अधिकतम तीन कार्यकाल (हर एक कार्यकाल चार वर्ष) या कुल 12 वर्षों की सीमा, और 70 वर्ष (आवश्यकतानुसार 75 वर्ष) तक आयु सीमा निर्धारित की गई है

3.2.5. पारदर्शिता एवं जवाबदेही

  • सभी मान्यता प्राप्त संघों को वार्षिक ऑडिट, सार्वजनिक खुलासा और वित्तीय अनुशासन का पालन कराना अनिवार्य, गैर-अनुपालन पर दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित।

  • RTI अधिनियम 2005 के तहत सभी सरकारी वित्तीय सहायता प्राप्त संघों को सार्वजनिक प्राधिकरण का दर्जा दिया गया है, हालांकि BCCI को इससे आंशिक छूट है (नीचे विस्तृत)

3.2.6. सुरक्षित खेल नीति एवं शिकायत निवारण

  • सभी NSFs में सेफ स्पोर्ट पॉलिसी लागू, POSH अधिनियम 2013 के अनुरूप, जिससे महिलाओं, बच्चों, व वंचित वर्ग के खिलाफ़ उत्पीड़न/शोषण से सुरक्षा मिलेगी।

  • NSF में आंतरिक शिकायत सेल, न्यायाधिकरण, और जरूरत पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट तक त्वरित, चरणबद्ध समाधान की व्यवस्था समर्थन में लाई गई है

3.2.7. अंतरराष्ट्रीय समन्वय

  • भारत में खेल संचालन के प्रावधान अब IOC, FIFA, वाडा जैसे निकायों के दिशा-निर्देशों के अनुरूप किए जाएंगे, खासकर डोपिंग, आचार संहिता, लैंगिक समानता, और शासन प्रणाली के संदर्भ में

3.2.8. BCCI, RTI और स्वायत्तता की विशिष्टता

  • BCCI को विधेयक के अधिकांश प्रावधानों के तहत लाया गया है, लेकिन RTI में उसे सिर्फ सरकारी मदद या सार्वजनिक संसाधन का लाभ लेने के मामले में ही जवाबदेह ठहराया गया है। BCCI की कानूनी स्थिति, ऐतिहासिक छूट, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश, और विधि आयोग की सिफारिशें इत्यादि के चलते यह व्यवस्था बनाई गई है

IV. कानूनी संरेखण, अधिनियम और प्रशासनिक नीति

4.1. कानूनी ढांचा और अधिनियम

  • संविधानिक दृष्टि से खेल एक राज्य सूची (सप्तम अनुसूची) का विषय है, परंतु केंद्र सरकार को भी कानून बनाने का अधिकार जनहित, आंतरिक सुरक्षा, और राष्ट्रीय संकेत (National Emblem) के उपयोग से जुड़े मामलों में है। इस नये अधिनियम के साथ खेल प्रशासन पर केंद्र का अधिक अधिकार लेकिन नियामक दृष्टि से, विकेंद्रीकरण के सिद्धांत को संजोए रखने की आवश्यकता अहम है

  • नियम निर्माण और अपवाद प्रावधान : केंद्र सरकार को नियम बनाने, पात्रता शर्तों में शिथिलता, या किसी राष्ट्रीय टीम की विदेश भागीदारी पर रोक लगाने का भी अधिकार है।

  • गैर-अनुपालन या दुरुपयोग के मामलों पर NSB को शक्तियां, और विशेष हालात में संघ के संचालन अधिकार केंद्र सरकार के पास आ सकते हैं।

4.2. नीति और कार्यान्वयन रणनीति

  • विधेयक का प्रमुख लक्ष्य खेल प्रशासनों में पारदर्शिता, जवाबदेही तथा प्रोफेशनल गवर्नेंस लाना है।

  • बीते कई वर्षों से न्यायालयों में चल रहे 350 से अधिक मुकदमों का समाधान अब न्यायाधिकरण के स्तर पर होगा, जिससे खिलाड़ियों के कैरियर और संघों के प्रशासनिक स्थायित्व को दिए गए झटकों में कमी आएगी

V. खिलाड़ियों के अधिकार, प्रतिनिधित्व और शिकायत समाधान प्रणाली

5.1. खिलाड़ियों के अधिकार तथा भागीदारी

  • निर्णय-निर्माण में खिलाड़ियों को सक्रिय भूमिका दी जाएगी – प्रत्येक संघ की चुनावी प्रक्रिया, वार्षिक आमसभा, और नीति निर्धारण कमेटियों में उत्कृष्ट खिलाड़ियों की भागीदारी अनिवार्य है।

  • खिलाड़ियों को चयन, प्रशिक्षण, अनुशासन और वित्तीय समर्थन संबंधी विषयों में शिकायत दर्ज करने, त्वरित न्यायालयीन समाधान और अपील की पूरी व्यवस्था दी गई है।

  • लैंगिक समानता, PWD (विशेष रूप से सक्षम या विकलांग खिलाड़ियों) समेत हाशिये पर रहे समूहों के प्रतिनिधित्व हेतु विशिष्ट प्रावधान हैं

5.2. चरणबद्ध विवाद समाधान

  1. प्रारंभिक शिकायत का निपटारा संघ के आंतरिक विवाद समाधान सेल में होगा।

  2. असंतुष्टि पर राष्ट्रीय खेल न्यायाधिकरण में मामला जाएगा।

  3. वास्तव में जटिल या अपील योग्य विवादों में, अंतिम समाधान के लिए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच का कानूनी अधिकार।

यह प्रक्रिया FIFA के डिस्प्यूट रेजोल्यूशन चैंबर और CAS (Court of Arbitration for Sport) जैसी अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं से प्रेरित है।

VI. राष्ट्रीय खेल महासंघों की भूमिका, जवाबदेही और पारदर्शिता

6.1. महासंघों की निगरानी व नियम

  • प्रत्येक NSF को अपने कामकाज, चुनाव, खाता-बही, और नीतिगत निर्णयों को सार्वजनिक करना अनिवार्य है।

  • चुनाव, लेखा, नीति-निर्माण और कार्यकारी समितियों के सभी रिकॉर्ड ऑनलाइन प्रकाशित करने होंगे।

  • गैर-अनुपालन का सीधा परिणाम– मान्यता निलंबन/रद्दीकरण और सरकारी मदद का रुकना है

6.2. महासंघों के अधिकार और दायित्व

  • BCCI समेत सभी NSFs को आचार संहिता, वित्तीय अनुशासन, खिलाड़ियों की सुरक्षा, और अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुपालन का पालन करना है।

  • संघ को चुनावी निष्पक्षता, प्रतिस्पर्धा योग्य सदस्य संख्या, महिलाओं/खिलाड़ियों के प्रतिनिधित्व, और पारदर्शी ऑडिट की जिम्मेदारी है।

VII. पारदर्शिता एवं जवाबदेही के कानूनी प्रावधान

7.1. सूचना का अधिकार और पारदर्शिता

  • भारत में पहली बार खेल संघों के कामकाज को RTI के दायरे में कानूनी दर्जा दिया गया। हालांकि BCCI के मामले में यह सिर्फ सरकारी मदद से जुड़े सवालों तक सीमित है, जिससे BCCI को व्यापक सार्वजनिक जांच से छूट बनी रहती है; इस पर समाज, प्रेस और विपक्ष ने आलोचना की है कि देश के सबसे अमीर बोर्ड को ’विशेष दर्जा’ न देकर RTI के तहत पूरी तरह जवाबदेह बनाया जाना चाहिए था

7.2. वित्तीय जवाबदेही

  • सभी खेल निकायों के लिए ऑडिटेड खातों का प्रकाशन, वार्षिक समर्थन रिपोर्ट, और उत्थान के लिए प्राप्त धन का उपयोग सार्वजनिक मंच पर दिव्य करना अनिवार्य बना दिया गया है। गैर-अनुपालन पर दंड और मान्यता समाप्ति का खतरा।

7.3. शिकायत निवारण और Whistleblower Protection

  • संघों के भीतर स्वतंत्र शिकायत अधिकारी, शिकायत सेल, तथा ’whistleblower protection’ (यूके, यूएस, ऑस्ट्रेलिया के मॉडल्स पर) now लागू है। इसका उद्देश्य अंदरूनी गड़बड़ी उजागर करने वालों की सुरक्षा करना है।

VIII. निवेश, खेल पारिस्थितिकी और अंतर्निहित चुनौतियाँ

8.1. खेल क्षेत्र का आर्थिक संदर्भ

  • 2023 में भारतीय खेल बाजार का 87% निवेश क्रिकेट केंद्रित था, जबकि फुटबॉल, हॉकी, बैडमिंटन, कबड्डी जैसे खेलों के लिए निवेश मात्र 13% तक सीमित रहा। पारदर्शी प्रणाली, कर लाभ, CSR (कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) और PPP (Public-Private Partnership) से गैर-क्रिकेट खेलों में निवेश बढ़ने की संभावना है।

8.2. जमीनी स्तर पर प्रतिभा खोज

  • नीति का एक उद्देश्य है — grassroots talent identification। अब ग्राम/ब्लॉक स्तर तक खिलाड़ियों की पहचान, प्रशिक्षण और जन्मजात प्रतिभाओं के पोषण हेतु समर्पित विभाग व योजनाएं बनाई जा रही हैं।

IX. आलोचना, चिंताएँ और चुनौतियाँ

9.1. केंद्रीकरण बनाम विकेंद्रीकरण

  • विपक्ष और कुछ खेल विशेषज्ञों का आरोप है कि विधेयक खेल प्रशासन में अत्यधिक केंद्रीकरण लाएगा, जिससे NSFs और IOA की स्वायत्तता पर खतरा हो सकता है। IOC के नियमों के अनुसार खेल निकायों में सरकारी हस्तक्षेप न हो, अन्यथा भारत के खिलाफ सजा (suspension) तक लग सकती है।

  • राज्य ओलंपिक संघ की भूमिका, ब्लॉक/जिला स्तर के खेल निकायों की शक्तियां, और जमीनी स्तर पर प्रतिभा विकास की रणनीतियाँ अभी स्पष्ट नहीं हैं

9.2. RTI में BCCI को छूट

  • RTI अधिनियम से BCCI को छूट देने पर प्रेस, विपक्ष और पिछले सुप्रीम कोर्ट, CIC, विधि आयोग की सिफारिशों की अनदेखी की गई, जबकि BCCI तमाम सरकारी लाभ लेता आया है (रियायती भूमि, टैक्स छूट, राष्ट्रीय चिन्ह का उपयोग आदि)। इससे विधेयक की पारदर्शिता भावना कमजोर हुई है

9.3. आयु-सीमा और कार्यकाल

  • प्रशासनिक पदों की आयु-सीमा 75 वर्ष तक करना, और कार्यकाल में लचीलापन सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ा सकता है। इसकी व्याख्या यह है कि अनुभवी भारतीय अधिकारी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में नेतृत्वकारी भूमिका पा सकें, लेकिन इसके दुष्परिणाम– युवाओं के नेतृत्व अवसर सीमित होना– पर भी चिंता जाहिर की गई है

9.4. संघों की स्वायत्तता और सरकार की सर्वोच्चता

  • NSB को अनुशासन, मान्यता, और निलंबन की असीम शक्ति केंद्रित कर देना संस्थागत कार्य-संस्कृति के लिए भविष्य में खतरा बन सकता है। यद्यपि सरकारी पक्ष का कहना है कि यह पारदर्शिता, नैतिकता, और प्रतिस्पर्धात्मकता का मार्ग है, आलोचक इसे प्रशासकीय तानाशाही के रूप में देखते हैं

X. अंतरराष्ट्रीय मानकों के साथ तुलना

  • विधेयक में IOC, FIFA, CAS जैसे अंतरराष्ट्रीय नियामकों के मॉडल को अपनाया गया है। भारत इस विधेयक के साथ खेल कानून रखने वाला 21वां देश बन गया है।

  • खिलाड़ियों की समिति, गहन डोपिंग नियंत्रण, लैंगिक संतुलन, वित्तीय उत्तरदायित्व, खेल विवादों की विशिष्ट अदालत– जैसे प्रावधान अब यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया या चीन के मॉडल्स के समकक्ष हैं

XI. भविष्य में संभावित प्रभाव

11.1. भारतीय खेलों पर प्रभाव

  • जवाबदेही, निष्पक्षता और तेज न्याय : खिलाड़ियों का चयन, वित्त, प्रशिक्षण, अस्त्र-शस्त्र प्रणाली अब तेजी से, निष्पक्ष ढंग से होगी, और खिलाड़ियों में निराशा/असंतोष वाले अवरोध घटेंगे।

  • नवाचार और निवेश : पारदर्शी प्रणाली से गैर-क्रिकेट खेलों में निवेश, प्रशिक्षण, CSR, व PPP बढ़ने की संभावना।

  • नारी सशक्तिकरण और सामाजिक समावेशन : महिला खिलाड़ियों के लिए नीति, सुरक्षा, और लैंगिक समानता मजबूत होगी।

  • ओलंपिक बोली : विधेयक IOC को प्रमाण देगा कि भारत खेल शासन में परिपक्व, संतुलित, पारदर्शी और उत्तरदायी है, जिससे 2036 ओलंपिक मेजबानी की भारत की दावेदारी मजबूत होगी

XII. लागूकरण चुनौतियाँ, समयसीमा एवं हितधारकों की प्रतिक्रिया

12.1. लागूकरण और संसाधन

  • विधेयक का लाभ तभी मिलेगा, जब इसे दिल से, तकनीकीय संसाधनों व आयोजकीय ईमानदारी से लागू किया जाएगा। पुराने पावर स्ट्रक्चर्स (status-quo alliances) अथवा विरोधाभास वाले घटकों से प्रत्याशित संघर्ष की आशंका बनी हुई है।

  • न्यायाधिकरण, अमले का गठन, चुनाव पैनल की नियुक्ति, और वित्तीय डेटा डिजिटलीकरण हेतु प्रशासनिक क्षमता व फंडिंग दोनों की दरकार रहेगी

12.2. हितधारकों की प्रतिक्रिया

  • समर्थन : IOA की अध्यक्ष पी.टी. उषा, पूर्व AIFF अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल जैसे दिग्गजों ने विधेयक को ’ऐतिहासिक’ करार दिया है, वहीं कई उत्कृष्ट खिलाड़ियों ने इसे ’खिलाड़ी-केंद्रित बदलाव’ बताया।

  • आलोचना : विपक्ष (BJD सांसद खुंटिया, कांग्रेस) तथा विशेषज्ञों ने केंद्रीकरण, राज्य संघों की अस्पष्ट भूमिका और RTI छूट को आड़े हाथों लिया है।

  • सरकारी पक्ष : खेल मंत्री ने इसे नियंत्रक नहीं, बल्कि पारदर्शिता लाने वाला विधेयक बताया

XIII. निष्कर्ष

राष्ट्रीय खेल शासन विधेयक, 2025 और उसके साथ पारित राष्ट्रीय एंटी-डोपिंग (संशोधन) विधेयक, 2025, भारतीय खेल ऐतिहासिक परिदृश्य में एक मील का पत्थर हैं। दशकों की धीमी नीति प्रक्रिया, प्रशासनिक असफलताओं, न्यायिक हस्तक्षेप, और बेला अधिकारियों/परिवारों के एकाधिकारवाद को चुनौती देते हुए, यह विधेयक भारत को एक प्रतियोगी, पारदर्शी, और उत्तरदायी "खेल राष्ट्र" बनने की ओर अग्रसर कर सकता है। हाँ, इस कार्यान्वयन में चेतन, सतर्क, और निरंतर निगरानी की आवश्यकता है। अगर विधेयक की भावना एवं प्रावधानों का ईमानदारी से पालन हुआ, तो आने वाले दशकों में भारत का खेल जगत न केवल अपने खिलाड़ियों के लिए, बल्कि पूरी दुनिया में एक जिम्मेदार, आदर्श और आधुनिक खेल प्रशासन का प्रतीक बन सकता है

संक्षिप्त रूप में, राष्ट्रीय खेल शासन विधेयक 2025 ने भारतीय खेल जगत को पुनर्संगठित करने की ठोस नींव डाली है, जिससे खिलाड़ियों के अधिकार, नीति में उनकी भागीदारी, पारदर्शिता, जवाबदेही, और अंतरराष्ट्रीय स्तर के समकक्ष परिणामों की ओर बढ़ने के स्पष्ट लक्षण दिखते हैं। इसकी पूरी सफलता क्रियान्वयन की निष्ठा, संसाधन-सक्षम प्रशासन, और सभी हितधारकों के स्वस्थ सहयोग पर निर्भर करेगी


लोकसभा में पारित विधेयकों का क्रमवार विवरण : मानसून सत्र 2025 की विशेष श्रृंखला

 



मैंने आज से  एक नई श्रृंखला शुरू की है, जिसमें आपको प्रतिदिन लोकसभा में पारित होने वाले सभी विधेयकों की जानकारी सरल भाषा में दी जाएगी। हर बिल का उद्देश्य, प्रमुख बिंदु और जनता पर संभावित असर इस श्रंखला में विस्तार से प्रस्तुत किया जाएगा। इस श्रंखला की शुरुआत मैं  मर्चेन्ट शिपिंग बिल 2025 से कर रही हूँ  |


मर्चेंट शिपिंग बिल 2025 का विस्तृत विश्लेषण


भारत में मर्चेंट शिपिंग बिल 2025: ऐतिहासिक, कानूनी, व्यावसायिक और अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में विस्तृत विश्लेषण


प्रस्तावना

21वीं सदी में वैश्विक व्यापार, समुद्री सुरक्षा और पर्यावरणीय सरोकारों के परिप्रेक्ष्य में भारत का समुद्री क्षेत्र लगातार तकनीकी, कारोबारी और विधायी सुधारों की माँग कर रहा था। इसी दिशा में मर्चेंट शिपिंग बिल 2025 (वाणिज्य पोत परिवहन विधेयक, 2025) हाल ही में संसद के दोनों सदनों से पारित हुआ, जिसने “मर्चेंट शिपिंग एक्ट 1958” जैसे दशकों पुराने विधायी ढांचे को प्रतिस्थापित कर दिया। इस रिपोर्ट में इस बिल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, विधेयक के प्रमुख प्रावधान, कानूनी और आर्थिक प्रभाव, अंतरराष्ट्रीय मेलबंदी, पर्यावरणीय एवं सामाजिक सरोकार, भारतीय समुद्री व्यापार एवं टनेज प्रोत्साहन, तथा भविष्यगत दिशा—इन सभी पहलुओं का स्तरीय विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। रिपोर्ट में संसद में हुई बहस, विपक्षी दृष्टिकोण, संशोधन प्रस्तावों और विभिन्न पक्षधारकों (stakeholders) के विचारों को भी सम्मिलित किया गया है, जिससे यह अध्ययन समग्र और संदर्भयुक्त बनता है।

1. ऐतिहासिक संदर्भ: भारत में समुद्री कानूनों का विकास

1.1 औपनिवेशिक युग और स्वतंत्रता पश्चात्

भारत में समुद्री कानूनों की नींव औपनिवेशिक काल में रखी गई थी, जिसमें ब्रिटेन के “Merchant Shipping Act 1894” और 1923 का “Indian Merchant Shipping Act” मुख्य स्रोत थे। स्वतंत्रता के बाद बदलती वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए 1958 में भारतीय संसद ने “Merchant Shipping Act 1958” पारित किया, जो भारत के जलक्षेत्र, जहाजों की रजिस्ट्री, स्वामित्व, सुरक्षा, पर्यावरण, नाविकों के कल्याण इत्यादि को नियंत्रित करता था2।

पिछले कुछ दशकों में, भारत के समुद्री कारोबारी मॉडल, अंतरराष्ट्रीय मानकों और तकनीकी उन्नतियों में बड़ा बदलाव आया है। 1958 का कानून अपनी जटिलता और औपनिवेशिक मानसिकता के कारण समय के साथ अप्रासंगिक और बोझिल माना जाने लगा था। इसके विभिन्न हिस्से कई बार संशोधित भी हुए, फिर भी अधुनातन समुद्री व्यापार एवं सुरक्षा संबंधी अपेक्षाओं को विधिवत रूप से संबोधित नहीं कर पाते थे।

1.2 विधायी पुनरावलोकन और नए सुधार

1990 के दशक से प्रतिवर्ष विभिन्न समीक्षाएँ, संसद में ड्राफ्ट बिल और विशेषज्ञ समितियों की रिपोर्ट सामने आईं, जिसने 1958 के कानून की भारी-भरकम, अपूर्ण और खंडित संरचना की ओर ध्यान खींचा। इसमें अंतरराष्ट्रीय कानूनों (IMO conventions, SOLAS, MARPOL, MLC, आदि) के समेकन की आवश्यकता, भारतीय टनेज और जहाज रजिस्ट्रेशन की नीति, समुद्री सुरक्षा और आपदा प्रबंधन आदि प्रमुख बिंदु थे4।

2016 और 2020 में ड्राफ्ट बिल आए, लेकिन विभिन्न सामाजिक, तकनीकी और विधायी कारणों से कानून में पूरी तरह परिवर्तन नहीं हो सका। अंततः, 2025 की संसद ने नई आर्थिक और सुरक्षा आवश्यकताओं के अनुरूप मर्चेंट शिपिंग बिल 2025 को प्रस्तुत एवं पारित किया।


2. संसद में प्रस्तावना, बहस एवं पारण

2.1 लोकसभा, राज्यसभा और विपक्ष की भूमिका

मर्चेंट शिपिंग बिल को लोकसभा ने 6 अगस्त 2025 को ध्वनिमत से पारित किया, जबकि राज्यसभा में 11 अगस्त को बहस के दौरान विपक्ष के सांसद बिहार में मतदाता सूची (SIR) की समीक्षा पर चर्चा न होने देने के विरोध में वाकआउट कर गए और बिल बिना चर्चा के पारित हो गया। कुछ विपक्षी सदस्यों ने सांकेतिक संशोधन भी प्रस्तुत किए थे। सत्तारूढ़ पक्ष की ओर से श्री सर्बानंद सोनोवाल (केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्री) ने विधेयक के व्यापक, आधुनिक, और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (IMO, MARPOL) की आवश्यकताओं के अनुरूप होने को रेखांकित किया6।

बहस के सीमित अवसरों पर वाईएसआर कांग्रेस के प्रतिनिधि ने भी विधेयक के ऐतिहासिक महत्व, समुद्री व्यापार के वृद्धि में इसकी भूमिका तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धा की आवश्यकता को केंद्र में रखा, वहीं विपक्ष ने सदन में पर्याप्त चर्चा न होने, संशोधन पर विचार न करने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बाधा की बात कही6।

3. प्रमुख उद्देश्य और नवाचार

मर्चेंट शिपिंग बिल 2025 के मुख्य उद्देश्य और नवाचार निम्न रूप में प्रकट होते हैं:

  • कानूनी ढांचे का आधुनिकीकरण: पुराने 67 वर्ष पुराने कानून को हटाकर सरल, पारदर्शी, डिजिटल और लागू करने में आसान व्यवस्था स्थापित करना।
  • अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप परिपालन: भारत को IMO तथा अन्य वैश्विक सम्मेलनों के अनुरूप लाना, जिससे भारतीय जहाजों की विश्वसनीयता, सुरक्षा प्रमाणन और वैधानिक स्वीकार्यता बढ़े।
  • व्यापार में सरलता और नवाचार: लाइसेंसिंग, रजिस्ट्रेशन, विवाद निवारण, लॉजिस्टिक्स प्रक्रिया को डिजिटल बनाते हुए भ्रष्टाचार एवं देरी को खत्म करना।
  • नाविक अधिकार और कल्याण: नाविकों के कार्यस्थल सुरक्षा, अनुबंध, वेतन, स्वास्थ्य सुविधा, शिकायत निवारण - सभी के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था देना।
  • पर्यावरण संरक्षण: MARPOL व अन्य सम्मेलनों के प्रावधानों के अनुरूप हर जहाज के लिए प्रदूषण निवारण प्रमाणपत्र अनिवार्य करना, समुद्री कचरा प्रबंधन के सख्त नियम लागू करना।
  • भारतीय टनेज प्रोत्साहन और निवेश: घरेलू जहाजरानी कारोबार को प्रवर्तित करना, स्वामित्व की परिभाषा विस्तृत करना, भारतीय ध्वज के अंतर्गत जहाजों की संख्या बढ़ाना और विदेशी निवेश आकर्षित करना3।

4. मर्चेंट शिपिंग बिल 2025: प्रमुख प्रावधानों का सार

बिल के मुख्य प्रावधान, उद्देश्य, संभावित प्रभाव निम्नलिखित हैं :

o  जहाजों की परिभाषा का विस्तार

उद्देश्य- सभी श्रेणियों, जैसे मोबाइल ऑफशोर ड्रिलिंग यूनिट, पनडुब्बियाँ, नॉन-डिसप्लेसमेंट क्राफ्ट को समाविष्ट करना

संभावित प्रभाव- शिपिंग कारोबारी मॉडल अधिक व्यापक, टेक्नोलॉजी-संगत


o  स्वामित्व के मानदंड में ढील

उद्देश्य- OCI, कम्पनियाँ, आंशिक स्वामित्व को अनुमति

संभावित प्रभाव- विदेशी निवेश, भारतीय ध्वज वाले जहाजों में वृद्धि


o  शिप रीसायक्लिंग पंजीकरण

उद्देश्य- शिप-ब्रेकिंग के लिए अस्थायी पंजीकरण

संभावित प्रभाव- भारत (विशेषकर अलंग) शिप-रिसायक्लिंग के वैश्विक हब हेतु सुदृढ़ता


o  पर्यावरणीय अनुशासन

उद्देश्य- MARPOL/IMO के अनुरूप हर जहाज के लिए प्रदूषण प्रमाणपत्र अनिवार्य

संभावित प्रभाव- समुद्री प्रदूषण में कमी, अंतर्राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स में भरोसा


o  DG Marine Administration को शक्तियाँ

उद्देश्य- समुद्री शिक्षा, प्रशिक्षण, संस्थानों का परीक्षण एवं मान्यता

संभावित प्रभाव- नाविकों का वैश्विक कौशल, प्रशिक्षण मानक सुधार


o  आपराधिक प्रावधान / दंड

उद्देश्य- राष्ट्रीयता छुपाना, जरूरी लाइसेंस के बिना एजेंसी चलाना, प्रदूषण फैलाना आदि अपराध

संभावित प्रभाव- अनुपालन बाध्यता, पर्यावरण/सुरक्षा मानकों को मजबूती


o  लाइसेंसिंग एवं डिजिटल प्रोसेस

उद्देश्य- पंजीकरण, लाइसेंस ऑनलाइन, प्रमाणपत्र डिजिटल

संभावित प्रभाव- भ्रष्टाचार, देरी, नौकरशाही में कमी


o  नाविकों का सामाजिक सुरक्षा

उद्देश्य- केन्द्र सरकार द्वारा निर्धारित सामाजिक सुरक्षा

संभावित प्रभाव- नाविकों व श्रमिकों के कल्याण में सुधार


o  अनुशासन, शिक्षा एवं प्रशिक्षण

उद्देश्य- DG को प्रतिस्थापित कर “Director General Marine Administration” की स्थापना

संभावित प्रभाव- वैधानिक प्रवर्तन, गुणवत्ता स्कूलिंग एवं नाविक सुरक्षा


o  समुद्री दुर्घटना जांच

उद्देश्य- दुर्घटनाओं की जाँच, पूछताछ व्यवस्था, जिम्मेदारी निर्धारण

संभावित प्रभाव- दुर्घटना रोकथाम, जवाबदेही की पारदर्शिता


प्रत्येक उपर्युक्त प्रावधान भारतीय समुद्री कारोबार, लॉजिस्टिक्स, निवेश और सुरक्षा-आधारित ढांचे को न केवल मजबूत करता है, बल्कि भारत की ‘ब्लू इकोनॉमी’ में दीर्घकालीन संभावनाएँ खोलता है|9


5. कानूनी ढांचा: अनुपालन, प्रशासन एवं विवाद निपटान

5.1 नूतन विधायी संरचना

बिल ने 16 भाग और 325 धाराओं में विभाजित संरचना प्रस्तुत की है (पहले 1958 कानून में 561 धाराएँ थीं)। यह संक्षिप्तता, स्पष्टता और अनुपालन की दृष्टि से अत्यंत लाभकारी सिद्ध होती है। इसके तहत—

  • Director General Marine Administration की संस्था, जो भारत के समुद्री क्षेत्र का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी है।
  • रजिस्ट्रेशन और लाइसेंसिंग रजिस्ट्रार द्वारा नियंत्रित, पूरी तरह डिजिटल व सुरक्षात्मक।
  • अनुबंध, विवाद, वेतन, अनुशासन, सामाजिक सुरक्षा आदि मामलों के लिए स्पष्ट विधायी आधार।
  • विशेष रूप से नाविकों के लिए करार, शिकायत निवारण पोर्टल, स्वास्थ्य सुविधा, और सामाजिक सुरक्षा का कानूनी संरक्षण।
  • पर्यावरणीय अपराध की स्थिति में कड़ी सजा और नागरिक दंड का प्रावधान।

5.2 अनुपालन व्यवस्था और व्यापारिक सुधार

नवीन विधेयक से “Ease of Doing Business” (कारोबार में सुगमता) को कानूनी आधार मिलता है। पुराने फॉर्म भरने, अनुमतियाँ लेने की जटिलता, भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी में भारी गिरावट अपेक्षित है। डॉक्यूमेंटेशन, ट्रांजैक्शन, लाइसेंस, विवादित भुगतान, बीमा—इन सभी में पारदर्शिता और डिजिटल प्रक्रिया की गारंटी मिलती है12।

5.3 दुर्घटना जांच प्रावधान

कोई भी समुद्री दुर्घटना अब प्राधिकृत संस्थान/अधिकारी के जांच-अधिकार में आएगी। दुर्घटनाओं के कारण, जिम्मेदारी, व्यवसायिक नुकसान, बीमा भुगतान, श्रमशक्ति के मसले आदि के समाधान हेतु जल्दी, डिजिटल व पारदर्शी व्यवस्था लागू होगी। इससे समुद्री पर्यावरण सुरक्षा और नाविकों के जीवन की गारंटी भी बेहतर ढंग से सुनिश्चित की जा सकती है8।

6. व्यावसायिक और आर्थिक पहलू

6.1 भारतीय पोत टनेज और निवेश प्रोत्साहन

अन्य प्रमुख देशों (सिंगापुर, चीन, UAE) की तरह भारत अपने जहाजों के टनेज को बढ़ाकर वैश्विक पोत-निर्यात में हिस्सेदारी मजबूत करना चाहता है। भारतीय ध्वज के अंतर्गत जहाजों की संख्या बढ़ाने के लिए विदेशी निवेश, OCI स्वामित्व, “फ्लैग ऑफ कन्विनियंस” जैसी व्यवस्थाओं का नियमन लचीला किया गया है। इससे शिपिंग कंपनियाँ अलंग, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता जैसे इंडियन पोर्ट्स पर अधिक जहाज रजिस्टर कर सकेंगी, जिससे रोजगार, आयात-निर्यात, लाइसेंसिंग चार्ज, मेन्टेनेन्स सुविधा, शिप रिसायक्लिंग—हर क्षेत्र में घरेलू कारोबार और सरकारी राजस्व बढ़ेगा14

6.2 टनेज कर (Tonnage Tax Scheme): वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता

भारत में जहाज कंपनियों की प्रतिस्पर्धा को “टनेज कर योजना” के तहत सहूलियत देना उल्लेखनीय है। इस नीति के अनुसार कंपनियों को उनके वास्तविक मुनाफे के बजाय जहाजों के वज़न (टन में) के आधार पर कर देना होता है, जिससे कर अनुपालन का बोझ कम होता है और कंपनियाँ इन्फ्रास्ट्रक्चर पर निवेश के लिए प्रोत्साहित होती हैं। यह व्यवस्था ब्रिटेन, सिंगापुर, जापान आदि द्वारा अपनाई गई समान अंतरराष्ट्रीय प्रथाओं के अनुरूप है15।

6.3 बंदरगाह और तटीय व्यापार

नवीन कानूनों के समेकित प्रभाव से भारतीय बंदरगाहों की माल हैंडलिंग और लॉजिस्टिक्स दक्षता में भारी सुधार आयेगा। सागरमाला, पोर्ट आधुनिकीकरण जैसी सरकारी पहलों से इन्हें उच्चस्तरीय वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं:

  • टर्नअराउंड टाइम में कमी
  • कंटेनर ड्वेल टाइम में कमी
  • बंदरगाह डिजिटलाइजेशन, पारदर्शिता, स्थानीय विवाद त्वरित समाधान

इससे न केवल कांसाइनर और कारोबारी लाभान्वित होंगे, बल्कि बंदरगाह आधारित रोजगार, तटीय राज्यों की अर्थव्यवस्था, और GDP वृद्धि को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा16।

7. अंतरराष्ट्रीय मानकों एवं तुलना

7.1 IMO, SOLAS, MARPOL आदि के साथ नयापन

भारतीय मर्चेंट शिपिंग बिल 2025 में International Maritime Organization (IMO), Safety of Life at Sea (SOLAS), Marine Pollution (MARPOL), Maritime Labour Convention (MLC) जैसे प्रमुख शोध-आधारित और प्रतिपादित मानकों को फॉलो अप किया गया है। अनिवार्य प्रदूषण नियंत्रण, जीवन सुरक्षा, दुर्घटना जांच, शिप-रिसायक्लिंग, सुरक्षा प्रमाणन इत्यादि में वैश्विक दिशानिर्देश लागू किए गए हैं।

इससे भारतीय जहाज, पोर्ट और नाविकों की अंतरराष्ट्रीय पहचान, बीमा-मूल्यांकन, रजिस्ट्रेशन, सेफ्टी ऑडिट आदि आसान होंगे। विश्व बैंक के लॉजिस्टिक्स प्रदर्शन सूचकांक, ग्लोबल पोर्ट्स कंसोर्टियम आदि में भारत की रैंक और सुधार के लिए नए अवसर खुले हैं।

7.2 प्रमुख देशों (सिंगापुर, यूएई, ब्रिटेन) के मॉडल की तुलना

अंतरराष्ट्रीय अनुभव का सारांश है—

  • ब्रिटेन: टनेज कर और 'ओपन रजिस्टर' नीति अपनाकर जहाज रजिस्ट्रेशन में सरलता और प्रतिस्पर्धा।
  • सिंगापुर: Tonnage Incentives और पोर्ट डिजिटलाइजेशन से भारतीय व्यापार मॉडल के नए अवसर।
  • UAE: अंतरराष्ट्रीय धनराशि समर्थित पोर्ट, विदेशी निवेश, फ्री ट्रेड पॉलिसी।

मर्चेंट शिपिंग बिल 2025 इन्हीं नीतियों से प्रेरित, किन्तु भारतीय सन्दर्भ के अनुरूप सुधारक है—जहाँ कारोबार में सरलता के साथ श्रमिक अधिकार, पर्यावरण सुरक्षा आदि की सुरक्षा की गई है।

8. समुद्री प्रदूषण और पर्यावरण सुरक्षा

8.1 MARPOL अनुरूपता

समुद्री प्रदूषण रोकने के लिए “प्रदूषण निवारण प्रमाणपत्र” (Pollution Prevention Certificate) का हर जहाज के लिए अनिवार्य प्रावधान, MARPOL कन्वेंशन के अनुरूप है। यह प्रावधान, सिर्फ बड़े टन भार के जहाजों पर नहीं, बल्कि सभी किस्म के व्यावसायिक जहाजों पर लागू होगा। अपंजीकृत या प्रदूषण प्रमाणपत्र के बिना स्थिति में नागरिक या आपराधिक दंड का प्रावधान है10।

जलवायु परिवर्तन और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को देखते हुए “ग्रीन पोर्ट”, “हरित समुद्री पहल”, तथा “क्लीन अप प्रोजेक्ट्स” को कानूनी बल प्राप्त हुआ है।

8.2 शिप रीसायक्लिंग, मलबा हटाने और दुर्घटनाओं का प्रबंधन

बिल में शिप रिसायक्लिंग के लिए अस्थायी पंजीकरण, मलबा हटाने के अधिकार और त्वरित बचाव जैसी व्यवस्थाएँ हैं। गुजरात के “अलंग शिप ब्रेकिंग यार्ड” जैसे केंद्रों में अंतरराष्ट्रीय निवेश का रास्ता खुलता है, जिससे भारत इस क्षेत्र में वैश्विक केंद्र बनता जा रहा है।

9. नाविकों के अधिकार व कल्याण

9.1 सामाजिक सुरक्षा, अनुबंध और विवाद समाधान

मर्चेंट शिपिंग बिल 2025 नाविकों (seafarers) व अन्य श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा, अनुबंध (करार), वेतन भुगतान, कार्य-घंटों की स्पष्टता, स्वास्थ्य एवं शिकायत निवारण की विधेयक बनाता है। केंद्र सरकार को व्यापक अधिकार हैं कि वह नाविकों के लिए ‘समाज कल्याण सामान्य’ सुरक्षा देने वाली सामाजिक योजनाएँ बनाए12।

9.2 प्रशिक्षण व वैश्विक स्तर की शिक्षा

DG Marine Administration को प्रशिक्षण, शिक्षा प्रोग्राम, पाठ्यक्रम निर्माण, संस्थानों की मान्यता की सभी शक्तियाँ दी गई हैं, जिससे आगामी वर्षों में भारतीय नाविक वैश्विक मानकों के अनुरूप होंगे। भारत पहले से ही 12% वैश्विक नाविक श्रमशक्ति का आपूर्तिकर्ता है, लक्ष्य इसे 20% तक बढ़ाना है।

10. टनेज, निवेश, निर्यात एवं ब्लू इकोनॉमी

10.1 ‘ब्लू इकोनॉमी’ का उभार

नवीन विधायी सुधारों से भारत की ‘ब्लू इकोनॉमी’—अर्थात समुद्र आधारित उद्योग, पोर्ट, टनेज, समुद्री पर्यटन, मत्स्य पालन, शिपब्रेकिंग आदि—को नई गति मिलेगी। भारत का लक्ष्य 2030 तक ‘230 मिलियन मीट्रिक टन’ तटीय कार्गो को संभालना और प्रमुख पोर्ट्स की क्षमता लगभग दोगुनी करना है16।

10.2 निर्यात प्रोत्साहन

सरकार की नीतियाँ—डीईपीबी, एसईआईएस, देय शुल्क वापसी, ब्याज समतुल्यीकरण, RoDTEP आदि—भारतीय निर्यातकों और व्यापारिक सशक्तिकरण हेतु विविध छूट, सब्सिडी, ऋण, कर प्रोत्साहन का प्रावधान देती हैं, जिससे ‘मेक इन इंडिया’ के तहत घरेलू उत्पाद वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनें।

11. संसद में चर्चा, पक्ष-विपक्ष व संशोधन

11.1 बहस, संशोधन और राजनैतिक विमर्श

इस विधेयक को त्वरित पारित किया गया और सम्यक चर्चा/संशोधन की अनुपस्थिति पर विपक्ष ने नाराजगी जताई। उनके अनुसार जहाज स्वामित्व प्रावधानों में पर्याप्त सुरक्षा, प्रांतीय राज्य हित, पर्यावरणीय निगरानी, नाविक कल्याण में व्यावहारिक चिंताओं की ओर और अधिक संवेदनशीलता अपेक्षित थी। फिर भी, सत्तापक्ष ने विधेयक की आधुनिक, प्रतिस्पर्धी और विश्वसनीय व्याख्या को प्रमुखता दी, और इसे आत्मनिर्भर (Aatmanirbhar), आत्मविश्वासी समुद्री राष्ट्र का मार्ग बताया5।

11.2 संशोधन प्रस्ताव व प्रमुख मुद्दे

जहाजों की परिभाषा, लाइसेंसिंग से जुड़े विवाद, शिप रिसायक्लिंग वाच-डॉग, पर्यावरण दंड, नाविकों के अनुबंध विवाद व अशक्त नाविक श्रमिकों हेतु त्वरित मुआवजा के तंत्र को और भी मजबूत करने के लिए संशोधन पेश हुए, किन्तु पारित नहीं हो पाए।

12. अंतरराष्ट्रीय/आर्थिक दस्तावेज, रिपोर्ट एवं नीति सहारा

  • Drishti IAS, PRS Legislative, PIB releases, News18, etvbharat, DD News, News On AIR, BharatSamachar, UPSC reports, Shiprocket, MarineGyaan, Shipmin.gov.in, Testbook आदि द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट/ड्राफ्ट/पॉलिसी डॉक्यूमेंट से प्रत्यक्ष रूप से सूचनाएँ, साक्ष्य और विश्लेषण अंतःस्थापित हैं।
  • “SAGARMALA”, “Maritime India Vision 2030”, “LPPI 2023-24”, “Green Port & Shipping”, “Digital Port System” जैसे मिशन संबंधी पहल और रिपोर्ट को भी नोट किया गया है।

13. प्रमुख पक्षधारकों (Stakeholders) और संभावित प्रभाव

13.1 शिप ओनर्स, निवेशक, निर्यातक

  • विदेशी और घरेलू स्वामित्व के व्यापक मानदंड, लाइसेंस/रजिस्ट्रेशन की पारदर्शिता, व्यावसायिक सुविधा, बीमा विवाद समाधान, मुआवजा व अनुबंध विवाद निपटान।

13.2 नाविक व श्रमिक संगठन

  • सामाजिक सुरक्षा, प्रशिक्षण, बीमा, वेतन एवं कार्य संकट निवारण हेतु पोर्टल-प्लेटफार्म, सुरक्षा स्पष्टता, शिकायत निवारण, श्रमिक अधिकार।

13.3 बंदरगाह राज्य सरकारें

  • छोटे बंदरगाह प्रबंधन, उपयोग फीस, विवाद समाधान का क्षेत्रीय अधिकार, इन्फ्रास्ट्रक्चर-अपग्रेडेशन, निवेश का प्रवाह।

13.4 पर्यावरणविद, सिविल सोसाइटी

  • प्रदूषण नियंत्रण, MARPOL और IMO प्रावधान की बाध्यता, तटीय राज्यों के लिए हरित समुद्री पहल, सतत विकास।

13.5 इंडस्ट्री, लॉजिस्टिक्स व बीमा कंपनियाँ

  • व्यवसायिक जोखिम, डिजिटल डॉक्यूमेंटेशन, दुर्घटना/क्षति समाधान, वैश्विक बीमा मानक, आसान प्रीमियम।

13.6 नीति निर्माता, अंतर्राष्ट्रीय संगठन

  • भारत की बढ़ती वैश्विक उपस्थिति, क्वालिटी-इंडिकेटर्स, लॉजिस्टिक्स परफॉर्मेन्स इंडेक्स, राजनीतिक-आर्थिक सुदृढ़ता।

14. भविष्यगत दृष्टिकोण, संभावनाएँ और चुनौतियाँ

14.1 सकारात्मक दिशा

  • भारतीय समुद्री उद्योग वैश्विक नेता बनने की दिशा में: अधिक निवेश, आधुनिक बंदरगाह, डिजिटल डॉक्यूमेंटेशन, हरित तकनीक के कारण भारत सिंगापुर, चीन, UAE, ब्रिटेन जैसे देशों की प्रतिस्पर्धा में मजबूती से उतरेगा।
  • नवाचार, योग्यता, और रोजगार: नाविकों के लिए वैश्विक स्तर की शिक्षा-प्रशिक्षण, किनारों पर हरित उद्योग, गिरते ट्रांजिट टाइम, बढ़ती नौकरियाँ।ब्लू इकोनॉमी का विस्तार: 2030 तक टनेज, लॉजिस्टिक्स, पोर्ट, टूरिज्म, मत्स्य पालन और शिप-रिसायक्लिंग से भारी वृद्धि के संकेत।
  • पर्यावरण, डिजिटल गवर्नेंस: प्रदूषण नियंत्रण, पोर्ट ग्रीन इनिशिएटिव्स, डिजिटल पोर्टल्स और शिकायत निवारण का प्रभावी कार्यान्वयन।

14.2 संभावित चुनौतियाँ

  • राज्य-केंद्र समन्वय: बंदरगाह अधिकार, स्थानीय विवाद, ट्रेड यूनियनों की माँग और नीतिगत समन्वय।
  • लागू करने की जमीनी चुनौतियाँ: तटीय राज्य, फंडिंग, पात्र लाभार्थी के डेटा संग्रह, समुद्री अपराध रोकथाम, पर्यावरणीय अंकेक्षण।
  • नवाचारों पर निर्भरता: शिपिंग कंपनियों के लिए नए प्रावधानों का बारीकी से अनुपालन, ट्रेनिंग, सोशल सिक्योरिटी स्कीम्स की डीप निगरानी।

15. निष्कर्ष

मर्चेंट शिपिंग बिल 2025 भारतीय समुद्री क्षेत्र के लिए एक युगांतकारी, समसामयिक और भविष्योन्मुखी कानूनी क्रांति है। यह सिर्फ 67 साल पुराने एक भारी-भरकम कानून को प्रतिस्थापित करके कारोबारी सरलता, वैश्विक प्रतिस्पर्धा, पर्यावरणीय जिम्मेदारी और सामाजिक सुरक्षा का नया युग प्रारंभ करता है। भारत की समुद्री शक्ति, तकनीकी नवाचार, पोर्ट प्रबंधन, वैश्विक निवेश और ब्लू इकोनॉमी के दौर में यह कानून निर्णायक भूमिका अदा करेगा।

इस विधेयक से—सरलीकृत कानूनी ढांचा, तत्काल परेशानी का समाधान, व्यवसाय में बदलाव, पर्यावरण का संरक्षण, सामाजिक न्याय और नीति की पारदर्शिता—ये सभी भारतीय समुद्री क्षेत्र को 21वीं सदी के अनुरूप वैश्विक शक्ति के रूप में उभारने वाले स्तम्भ सिद्ध होंगे।

संक्षिप्त प्रमुख बिंदु:

  • ऐतिहासिक विरासत से आद्यतन, प्रासंगिक कानून का निर्माण।
  • पारदर्शी, डिजिटल और समावेशी कारोबारी माहौल।
  • पर्यावरणीय सुरक्षा, नाविक कल्याण एवं सामाजिक अंतर्राष्ट्रीय जिम्मेदारी।
  • टनेज कर-प्रोत्साहन, निर्यात-नवाचार, और सशक्त ब्लू इकोनॉमी।

अंततः, मर्चेंट शिपिंग बिल 2025 भारत में व्यापार, सुरक्षा, नवाचार और विश्वसनीयता का नया युग प्रारंभ करता है, जिसकी मिसाल भविष्य के वैश्विक समुद्री विधायी परिवर्तनों में भी दी जाएगी।




References


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