राष्ट्रीय खेल शासन बिल 2025 का विस्तृत विश्लेषण
भारत में हाल ही में लोकसभा में पारित राष्ट्रीय खेल शासन बिल 2025 : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, विधायी प्रक्रिया और भारतीय खेल क्षेत्र पर प्रभाव
प्रस्तावना
भारत में खेल नीति का इतिहास अक्सर प्रशासनिक अनियमितताओं, जवाबदेही की कमी और नीति गठन में खिलाड़ियों के सीमित हस्तक्षेप की वजह से विवादों के घेरे में रहा है। बीते वर्षों में देश ने चाहे ओलंपिक, एशियाई या कॉमनवेल्थ गेम्स में भाग लिया हो, मगर खेल संगठनों में भाई-भतीजावाद, वित्तीय गड़बड़ी, और निर्णय-निर्माण में पारदर्शिता की कमी हमेशा से उठती रही है। इन्हीं चिर-स्थायी समस्याओं के समाधान के लिए अगस्त 2025 में भारतीय संसद ने राष्ट्रीय खेल शासन विधेयक, 2025 पारित किया। विशेषज्ञों के अनुसार, यह बिल भारतीय खेल प्रशासन में अबतक का सर्वाधिक मर्यादित और दूरगामी कानूनी सुधार है, जो न सिर्फ हालिया प्रशासनिक विफलताओं का निदान करता है, बल्कि भारत को एक उभरती खेल महाशक्ति के रूप में स्थापित करने का रोडमैप भी प्रस्तुत करता है।
I. भारत में खेल शासन का ऐतिहासिक संदर्भ
1.1. नीति का विकास और चुनौतियाँ
स्वतंत्रता के बाद भारत में खेलों के सरकारी प्रोत्साहन की प्रक्रिया धीमी और बिखरी रही। 1950 के दशक में केंद्र सरकार द्वारा अखिल भारतीय खेल परिषद (AICS) की स्थापना की गई, जो खिलाड़ियों के लिए सहयोग और सरकारी सलाह का मुख्य केंद्र होकर भी पर्याप्त बजटीय समर्थन से वंचित रही। वर्ष 1982 में IX एशियाई खेलों के आयोजन के दौरान पहली बार खेल विभाग स्थापित हुआ और 1984 में प्रथम राष्ट्रीय खेल नीति (NSP) लागू की गई। वर्ष 2000 में खेल और युवा मामले का अलग मंत्रालय गठित हुआ।
1986 में भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) की स्थापना क्रियान्वयन के उद्देश्य से की गई और 2001 तक खेल प्रशासन राज्यों की जिम्मेदारी रहता आया, जिससे निष्पादन में असमानता रही। उदारीकरण (1991) के बाद केबल टीवी, स्पॉन्सरशिप और मीडिया की वजह से खेलों की दृश्यता में काफी वृद्धि हुई, परंतु यह प्रभाव क्रिकेट तक ही सीमित रहा।
महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदमों में 2011 की राष्ट्रीय खेल विकास संहिता (NSDCI) शामिल रही, लेकिन इसे भी आम सहमति और कानूनी मजबूती के अभाव में लागू नहीं किया जा सका। इसी प्रशासनिक असफलता ने न्यायालयों के निरंतर हस्तक्षेप, चुनावी विवादों तथा अस्थाई समितियों के जरिए महासंघों के संचालन को जन्म दिया। प्रमुख खेल संघों में भ्रष्टाचार, चयन विवाद, और डोपिंग मामलों ने खिलाड़ियों की छवि, सरकार के विश्वास तथा भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा दोनों पर प्रतिकूल असर डाला।
1.2. भारतीय खेल नीति का ढांचा
भारत का खेल शासन सरकार, भारतीय ओलंपिक संघ (IOA), राज्य ओलंपिक संघ, राष्ट्रीय खेल महासंघ (NSFs), और भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) जैसे दसियों हितधारकों की बहुस्तरीय व्यवस्था पर टिका है। दुर्भाग्य से इस ढांचे में अधिकारों एवं उत्तरदायित्व का अस्पष्ट सीमांकन, स्वायत्तता के नाम पर नियंत्रण की कमी, राजस्व प्रबंधन में अनियमितता, और खिलाड़ियों के चयन-संबंधी विवाद लगातार उठते रहे।
II. राष्ट्रीय खेल शासन विधेयक 2025 : विधायी प्रक्रिया एवं नवीन अधिनियम
2.1. विधायी प्रक्रिया की मुख्य अवस्थाएँ
23 जुलाई 2025 को केंद्र सरकार ने यह विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया। 11 अगस्त को लोकसभा तथा अगले ही दिन राज्यसभा में सीमित चर्चा के साथ यह विधेयक ध्वनि मत से पारित हो गया। 18 अगस्त को राष्ट्रपति की मंजूरी के साथ ही यह विधेयक अधिनियम बन गया और इसका आधिकारिक गजट प्रकाशित हुआ। यह बिल वर्ष 2011, 2013, 2017 और 2019 के खेल विधेयकों से प्रेरित होकर अनेकों stakeholder consultations, IOA, NSFs, खिलाड़ियों, वरिष्ठ खिलाड़ियों व कानूनी विशेषज्ञों के फीडबैक से रूपांकित हुआ।
2.2. विधेयक का ऐतिहासिक महत्व
अब भारत उन विशिष्ट देशों की श्रेणी में आ गया है, जहाँ खेल प्रशासन हेतु एक समग्र, विधायी और कानूनी नियंत्रण वाली व्यवस्था है– जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, चीन और जापान। इसी विधिक-प्रशासनिक सुधार की सख्त जरूरत पिछले एक दशक से महसूस हो रही थी, जब बार-बार विभिन्न खेल संघों की स्वायत्तता, मुकदमेबाजी, और खिलाड़ियों की असंतुष्टि के मामले मीडिया व अदालतों में उभरते रहे।
III. विधेयक के उद्देश्य एवं प्रमुख प्रावधान
3.1. विधेयक के उद्देश्य
खेल संघों में पारदर्शिता और जवाबदेही लाना,
खिलाड़ियों की भागीदारी और अधिकार सुनिश्चित करना,
खेल विवादों के त्वरित एवं निष्पक्ष निपटान हेतु स्वतंत्र न्यायाधिकरण स्थापित करना,
प्रशासनिक सुधार और नीति-निर्माण में पेशेवराना एवं नैतिक दृष्टिकोण को प्राथमिकता देना,
अंतरराष्ट्रीय मानकों (IOC, FIFA, WADA) के अनुरूप भारतीय खेल निकायों और उसके संचालन को सुव्यवस्थित करना,
2036 ओलंपिक मेजबानी हेतु भारत की दावेदारी मजबूत करना।
3.2. विधेयक की संरचना और मुख्य प्रावधान
3.2.1. राष्ट्रीय खेल बोर्ड (NSB)
गठन ও अधिकार : एक स्वतंत्र, नियामक संस्था– NSB– के गठन का प्रावधान, जो सभी NSFs को नियमन, मान्यता, निलंबन/रद्दीकरण, वित्तीय निगरानी, आचार संहिता तथा चुनावों की व्यवस्था करेगा। NSB में एक अध्यक्ष व सदस्य होंगे, जिनका चयन खोज-सह-चयन समिति की सिफारिश पर केंद्र सरकार करेगी। चयन समिति में कैबिनेट सचिव/खेल सचिव, SAI के महानिदेशक, वरिष्ठ खेल प्रशासक और प्रतिष्ठित खिलाड़ी शामिल रहेंगे।
NSB के पास किसी खेल संघ में चुनावी गड़बड़ी, वित्तीय हेराफेरी, सालाना लेखा प्रकाशन न करने या अंतरराष्ट्रीय विधियों के उल्लंघन की दशा में उस संघ की मान्यता रद्द या निलंबित करने की शक्ति है। अनुशासनात्मक कार्रवाई से पूर्व संबंधित वैश्विक संस्था से परामर्श आवश्यक है।
NSB, एसोसिएशन के सार्वजनिक धन के दुरुपयोग की स्थिति में, स्वतः कार्रवाई कर सकता है और उसे लेखा/ऑडिट रिपोर्ट, चुनावी प्रक्रिया, और वित्तीय समता पर निगरानी का कानूनी अधिकार भी प्राप्त है।
3.2.2. राष्ट्रीय खेल न्यायाधिकरण
संरचना: तीन सदस्यीय राष्ट्रीय खेल न्यायाधिकरण का गठन, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान/पूर्व न्यायाधीश या उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अध्यक्ष होंगे। यह बोर्ड दीवानी न्यायालय-समान शक्तिसंपन्न होगा।
कार्यक्षेत्र: संघों/खिलाड़ियों के चयन, चुनाव व आंतरिक विवाद एवं अनुशासन के प्रकरण में सुनवाई कर सकेगा।
अपील की व्यवस्था: न्यायाधिकरण के फैसले के विरुद्ध अंतिम अपील केवल सुप्रीम कोर्ट में होगी। निचली अदालतों की जगह अब यह न्यायाधिकरण खिलाड़ियों को त्वरित न्याय देगा।
3.2.3. राष्ट्रीय खेल चुनाव पैनल
स्वतन्त्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए भारत निर्वाचन आयोग/राज्य निर्वाचन आयोग के पूर्व अधिकारी चुनाव पैनल में रहेंगे जो खेल संघों के चुनाव की निगरानी करेंगे। यह केंद्रीय पैनल सभी NSFs में निर्वाचन अधिकारी के तौर पर कार्य करेगा।
3.2.4. खिलाड़ी-केंद्रित प्रतिनिधित्व और लैंगिक संतुलन
प्रत्येक NSF की कार्यकारी समिति में 25% पूर्व खिलाड़ी तथा सर्वोत्तम 10% संयुक्त सदस्य (voting members) अनिवार्य रूप से खिलाड़ी होंगे।
कम से कम 33% महिला प्रतिनिधित्व अनिवार्य, जिससे लैंगिक विविधता, सुरक्षा और महिला खिलाड़ियों के सशक्तिकरण को बल मिलेगा।
प्रमुख पदों– अध्यक्ष, महासचिव, कोषाध्यक्ष– के लिए अधिकतम तीन कार्यकाल (हर एक कार्यकाल चार वर्ष) या कुल 12 वर्षों की सीमा, और 70 वर्ष (आवश्यकतानुसार 75 वर्ष) तक आयु सीमा निर्धारित की गई है।
3.2.5. पारदर्शिता एवं जवाबदेही
सभी मान्यता प्राप्त संघों को वार्षिक ऑडिट, सार्वजनिक खुलासा और वित्तीय अनुशासन का पालन कराना अनिवार्य, गैर-अनुपालन पर दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित।
RTI अधिनियम 2005 के तहत सभी सरकारी वित्तीय सहायता प्राप्त संघों को सार्वजनिक प्राधिकरण का दर्जा दिया गया है, हालांकि BCCI को इससे आंशिक छूट है (नीचे विस्तृत)।
3.2.6. सुरक्षित खेल नीति एवं शिकायत निवारण
सभी NSFs में सेफ स्पोर्ट पॉलिसी लागू, POSH अधिनियम 2013 के अनुरूप, जिससे महिलाओं, बच्चों, व वंचित वर्ग के खिलाफ़ उत्पीड़न/शोषण से सुरक्षा मिलेगी।
NSF में आंतरिक शिकायत सेल, न्यायाधिकरण, और जरूरत पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट तक त्वरित, चरणबद्ध समाधान की व्यवस्था समर्थन में लाई गई है।
3.2.7. अंतरराष्ट्रीय समन्वय
भारत में खेल संचालन के प्रावधान अब IOC, FIFA, वाडा जैसे निकायों के दिशा-निर्देशों के अनुरूप किए जाएंगे, खासकर डोपिंग, आचार संहिता, लैंगिक समानता, और शासन प्रणाली के संदर्भ में।
3.2.8. BCCI, RTI और स्वायत्तता की विशिष्टता
BCCI को विधेयक के अधिकांश प्रावधानों के तहत लाया गया है, लेकिन RTI में उसे सिर्फ सरकारी मदद या सार्वजनिक संसाधन का लाभ लेने के मामले में ही जवाबदेह ठहराया गया है। BCCI की कानूनी स्थिति, ऐतिहासिक छूट, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश, और विधि आयोग की सिफारिशें इत्यादि के चलते यह व्यवस्था बनाई गई है।
IV. कानूनी संरेखण, अधिनियम और प्रशासनिक नीति
4.1. कानूनी ढांचा और अधिनियम
संविधानिक दृष्टि से खेल एक राज्य सूची (सप्तम अनुसूची) का विषय है, परंतु केंद्र सरकार को भी कानून बनाने का अधिकार जनहित, आंतरिक सुरक्षा, और राष्ट्रीय संकेत (National Emblem) के उपयोग से जुड़े मामलों में है। इस नये अधिनियम के साथ खेल प्रशासन पर केंद्र का अधिक अधिकार लेकिन नियामक दृष्टि से, विकेंद्रीकरण के सिद्धांत को संजोए रखने की आवश्यकता अहम है।
नियम निर्माण और अपवाद प्रावधान : केंद्र सरकार को नियम बनाने, पात्रता शर्तों में शिथिलता, या किसी राष्ट्रीय टीम की विदेश भागीदारी पर रोक लगाने का भी अधिकार है।
गैर-अनुपालन या दुरुपयोग के मामलों पर NSB को शक्तियां, और विशेष हालात में संघ के संचालन अधिकार केंद्र सरकार के पास आ सकते हैं।
4.2. नीति और कार्यान्वयन रणनीति
विधेयक का प्रमुख लक्ष्य खेल प्रशासनों में पारदर्शिता, जवाबदेही तथा प्रोफेशनल गवर्नेंस लाना है।
बीते कई वर्षों से न्यायालयों में चल रहे 350 से अधिक मुकदमों का समाधान अब न्यायाधिकरण के स्तर पर होगा, जिससे खिलाड़ियों के कैरियर और संघों के प्रशासनिक स्थायित्व को दिए गए झटकों में कमी आएगी।
V. खिलाड़ियों के अधिकार, प्रतिनिधित्व और शिकायत समाधान प्रणाली
5.1. खिलाड़ियों के अधिकार तथा भागीदारी
निर्णय-निर्माण में खिलाड़ियों को सक्रिय भूमिका दी जाएगी – प्रत्येक संघ की चुनावी प्रक्रिया, वार्षिक आमसभा, और नीति निर्धारण कमेटियों में उत्कृष्ट खिलाड़ियों की भागीदारी अनिवार्य है।
खिलाड़ियों को चयन, प्रशिक्षण, अनुशासन और वित्तीय समर्थन संबंधी विषयों में शिकायत दर्ज करने, त्वरित न्यायालयीन समाधान और अपील की पूरी व्यवस्था दी गई है।
लैंगिक समानता, PWD (विशेष रूप से सक्षम या विकलांग खिलाड़ियों) समेत हाशिये पर रहे समूहों के प्रतिनिधित्व हेतु विशिष्ट प्रावधान हैं।
5.2. चरणबद्ध विवाद समाधान
प्रारंभिक शिकायत का निपटारा संघ के आंतरिक विवाद समाधान सेल में होगा।
असंतुष्टि पर राष्ट्रीय खेल न्यायाधिकरण में मामला जाएगा।
वास्तव में जटिल या अपील योग्य विवादों में, अंतिम समाधान के लिए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच का कानूनी अधिकार।
यह प्रक्रिया FIFA के डिस्प्यूट रेजोल्यूशन चैंबर और CAS (Court of Arbitration for Sport) जैसी अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं से प्रेरित है।
VI. राष्ट्रीय खेल महासंघों की भूमिका, जवाबदेही और पारदर्शिता
6.1. महासंघों की निगरानी व नियम
प्रत्येक NSF को अपने कामकाज, चुनाव, खाता-बही, और नीतिगत निर्णयों को सार्वजनिक करना अनिवार्य है।
चुनाव, लेखा, नीति-निर्माण और कार्यकारी समितियों के सभी रिकॉर्ड ऑनलाइन प्रकाशित करने होंगे।
गैर-अनुपालन का सीधा परिणाम– मान्यता निलंबन/रद्दीकरण और सरकारी मदद का रुकना है।
6.2. महासंघों के अधिकार और दायित्व
BCCI समेत सभी NSFs को आचार संहिता, वित्तीय अनुशासन, खिलाड़ियों की सुरक्षा, और अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुपालन का पालन करना है।
संघ को चुनावी निष्पक्षता, प्रतिस्पर्धा योग्य सदस्य संख्या, महिलाओं/खिलाड़ियों के प्रतिनिधित्व, और पारदर्शी ऑडिट की जिम्मेदारी है।
VII. पारदर्शिता एवं जवाबदेही के कानूनी प्रावधान
7.1. सूचना का अधिकार और पारदर्शिता
भारत में पहली बार खेल संघों के कामकाज को RTI के दायरे में कानूनी दर्जा दिया गया। हालांकि BCCI के मामले में यह सिर्फ सरकारी मदद से जुड़े सवालों तक सीमित है, जिससे BCCI को व्यापक सार्वजनिक जांच से छूट बनी रहती है; इस पर समाज, प्रेस और विपक्ष ने आलोचना की है कि देश के सबसे अमीर बोर्ड को ’विशेष दर्जा’ न देकर RTI के तहत पूरी तरह जवाबदेह बनाया जाना चाहिए था।
7.2. वित्तीय जवाबदेही
सभी खेल निकायों के लिए ऑडिटेड खातों का प्रकाशन, वार्षिक समर्थन रिपोर्ट, और उत्थान के लिए प्राप्त धन का उपयोग सार्वजनिक मंच पर दिव्य करना अनिवार्य बना दिया गया है। गैर-अनुपालन पर दंड और मान्यता समाप्ति का खतरा।
7.3. शिकायत निवारण और Whistleblower Protection
संघों के भीतर स्वतंत्र शिकायत अधिकारी, शिकायत सेल, तथा ’whistleblower protection’ (यूके, यूएस, ऑस्ट्रेलिया के मॉडल्स पर) now लागू है। इसका उद्देश्य अंदरूनी गड़बड़ी उजागर करने वालों की सुरक्षा करना है।
VIII. निवेश, खेल पारिस्थितिकी और अंतर्निहित चुनौतियाँ
8.1. खेल क्षेत्र का आर्थिक संदर्भ
2023 में भारतीय खेल बाजार का 87% निवेश क्रिकेट केंद्रित था, जबकि फुटबॉल, हॉकी, बैडमिंटन, कबड्डी जैसे खेलों के लिए निवेश मात्र 13% तक सीमित रहा। पारदर्शी प्रणाली, कर लाभ, CSR (कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) और PPP (Public-Private Partnership) से गैर-क्रिकेट खेलों में निवेश बढ़ने की संभावना है।
8.2. जमीनी स्तर पर प्रतिभा खोज
नीति का एक उद्देश्य है — grassroots talent identification। अब ग्राम/ब्लॉक स्तर तक खिलाड़ियों की पहचान, प्रशिक्षण और जन्मजात प्रतिभाओं के पोषण हेतु समर्पित विभाग व योजनाएं बनाई जा रही हैं।
IX. आलोचना, चिंताएँ और चुनौतियाँ
9.1. केंद्रीकरण बनाम विकेंद्रीकरण
विपक्ष और कुछ खेल विशेषज्ञों का आरोप है कि विधेयक खेल प्रशासन में अत्यधिक केंद्रीकरण लाएगा, जिससे NSFs और IOA की स्वायत्तता पर खतरा हो सकता है। IOC के नियमों के अनुसार खेल निकायों में सरकारी हस्तक्षेप न हो, अन्यथा भारत के खिलाफ सजा (suspension) तक लग सकती है।
राज्य ओलंपिक संघ की भूमिका, ब्लॉक/जिला स्तर के खेल निकायों की शक्तियां, और जमीनी स्तर पर प्रतिभा विकास की रणनीतियाँ अभी स्पष्ट नहीं हैं।
9.2. RTI में BCCI को छूट
RTI अधिनियम से BCCI को छूट देने पर प्रेस, विपक्ष और पिछले सुप्रीम कोर्ट, CIC, विधि आयोग की सिफारिशों की अनदेखी की गई, जबकि BCCI तमाम सरकारी लाभ लेता आया है (रियायती भूमि, टैक्स छूट, राष्ट्रीय चिन्ह का उपयोग आदि)। इससे विधेयक की पारदर्शिता भावना कमजोर हुई है।
9.3. आयु-सीमा और कार्यकाल
प्रशासनिक पदों की आयु-सीमा 75 वर्ष तक करना, और कार्यकाल में लचीलापन सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ा सकता है। इसकी व्याख्या यह है कि अनुभवी भारतीय अधिकारी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में नेतृत्वकारी भूमिका पा सकें, लेकिन इसके दुष्परिणाम– युवाओं के नेतृत्व अवसर सीमित होना– पर भी चिंता जाहिर की गई है।
9.4. संघों की स्वायत्तता और सरकार की सर्वोच्चता
NSB को अनुशासन, मान्यता, और निलंबन की असीम शक्ति केंद्रित कर देना संस्थागत कार्य-संस्कृति के लिए भविष्य में खतरा बन सकता है। यद्यपि सरकारी पक्ष का कहना है कि यह पारदर्शिता, नैतिकता, और प्रतिस्पर्धात्मकता का मार्ग है, आलोचक इसे प्रशासकीय तानाशाही के रूप में देखते हैं।
X. अंतरराष्ट्रीय मानकों के साथ तुलना
विधेयक में IOC, FIFA, CAS जैसे अंतरराष्ट्रीय नियामकों के मॉडल को अपनाया गया है। भारत इस विधेयक के साथ खेल कानून रखने वाला 21वां देश बन गया है।
खिलाड़ियों की समिति, गहन डोपिंग नियंत्रण, लैंगिक संतुलन, वित्तीय उत्तरदायित्व, खेल विवादों की विशिष्ट अदालत– जैसे प्रावधान अब यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया या चीन के मॉडल्स के समकक्ष हैं।
XI. भविष्य में संभावित प्रभाव
11.1. भारतीय खेलों पर प्रभाव
जवाबदेही, निष्पक्षता और तेज न्याय : खिलाड़ियों का चयन, वित्त, प्रशिक्षण, अस्त्र-शस्त्र प्रणाली अब तेजी से, निष्पक्ष ढंग से होगी, और खिलाड़ियों में निराशा/असंतोष वाले अवरोध घटेंगे।
नवाचार और निवेश : पारदर्शी प्रणाली से गैर-क्रिकेट खेलों में निवेश, प्रशिक्षण, CSR, व PPP बढ़ने की संभावना।
नारी सशक्तिकरण और सामाजिक समावेशन : महिला खिलाड़ियों के लिए नीति, सुरक्षा, और लैंगिक समानता मजबूत होगी।
ओलंपिक बोली : विधेयक IOC को प्रमाण देगा कि भारत खेल शासन में परिपक्व, संतुलित, पारदर्शी और उत्तरदायी है, जिससे 2036 ओलंपिक मेजबानी की भारत की दावेदारी मजबूत होगी।
XII. लागूकरण चुनौतियाँ, समयसीमा एवं हितधारकों की प्रतिक्रिया
12.1. लागूकरण और संसाधन
विधेयक का लाभ तभी मिलेगा, जब इसे दिल से, तकनीकीय संसाधनों व आयोजकीय ईमानदारी से लागू किया जाएगा। पुराने पावर स्ट्रक्चर्स (status-quo alliances) अथवा विरोधाभास वाले घटकों से प्रत्याशित संघर्ष की आशंका बनी हुई है।
न्यायाधिकरण, अमले का गठन, चुनाव पैनल की नियुक्ति, और वित्तीय डेटा डिजिटलीकरण हेतु प्रशासनिक क्षमता व फंडिंग दोनों की दरकार रहेगी।
12.2. हितधारकों की प्रतिक्रिया
समर्थन : IOA की अध्यक्ष पी.टी. उषा, पूर्व AIFF अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल जैसे दिग्गजों ने विधेयक को ’ऐतिहासिक’ करार दिया है, वहीं कई उत्कृष्ट खिलाड़ियों ने इसे ’खिलाड़ी-केंद्रित बदलाव’ बताया।
आलोचना : विपक्ष (BJD सांसद खुंटिया, कांग्रेस) तथा विशेषज्ञों ने केंद्रीकरण, राज्य संघों की अस्पष्ट भूमिका और RTI छूट को आड़े हाथों लिया है।
सरकारी पक्ष : खेल मंत्री ने इसे नियंत्रक नहीं, बल्कि पारदर्शिता लाने वाला विधेयक बताया।
XIII. निष्कर्ष
राष्ट्रीय खेल शासन विधेयक, 2025 और उसके साथ पारित राष्ट्रीय एंटी-डोपिंग (संशोधन) विधेयक, 2025, भारतीय खेल ऐतिहासिक परिदृश्य में एक मील का पत्थर हैं। दशकों की धीमी नीति प्रक्रिया, प्रशासनिक असफलताओं, न्यायिक हस्तक्षेप, और बेला अधिकारियों/परिवारों के एकाधिकारवाद को चुनौती देते हुए, यह विधेयक भारत को एक प्रतियोगी, पारदर्शी, और उत्तरदायी "खेल राष्ट्र" बनने की ओर अग्रसर कर सकता है। हाँ, इस कार्यान्वयन में चेतन, सतर्क, और निरंतर निगरानी की आवश्यकता है। अगर विधेयक की भावना एवं प्रावधानों का ईमानदारी से पालन हुआ, तो आने वाले दशकों में भारत का खेल जगत न केवल अपने खिलाड़ियों के लिए, बल्कि पूरी दुनिया में एक जिम्मेदार, आदर्श और आधुनिक खेल प्रशासन का प्रतीक बन सकता है।
संक्षिप्त रूप में, राष्ट्रीय खेल शासन विधेयक 2025 ने भारतीय खेल जगत को पुनर्संगठित करने की ठोस नींव डाली है, जिससे खिलाड़ियों के अधिकार, नीति में उनकी भागीदारी, पारदर्शिता, जवाबदेही, और अंतरराष्ट्रीय स्तर के समकक्ष परिणामों की ओर बढ़ने के स्पष्ट लक्षण दिखते हैं। इसकी पूरी सफलता क्रियान्वयन की निष्ठा, संसाधन-सक्षम प्रशासन, और सभी हितधारकों के स्वस्थ सहयोग पर निर्भर करेगी

