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लोकसभा में पारित विधेयकों का क्रमवार विवरण : मानसून सत्र 2025 की विशेष श्रृंखला

 



मैंने आज से  एक नई श्रृंखला शुरू की है, जिसमें आपको प्रतिदिन लोकसभा में पारित होने वाले सभी विधेयकों की जानकारी सरल भाषा में दी जाएगी। हर बिल का उद्देश्य, प्रमुख बिंदु और जनता पर संभावित असर इस श्रंखला में विस्तार से प्रस्तुत किया जाएगा। इस श्रंखला की शुरुआत मैं  मर्चेन्ट शिपिंग बिल 2025 से कर रही हूँ  |


मर्चेंट शिपिंग बिल 2025 का विस्तृत विश्लेषण


भारत में मर्चेंट शिपिंग बिल 2025: ऐतिहासिक, कानूनी, व्यावसायिक और अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में विस्तृत विश्लेषण


प्रस्तावना

21वीं सदी में वैश्विक व्यापार, समुद्री सुरक्षा और पर्यावरणीय सरोकारों के परिप्रेक्ष्य में भारत का समुद्री क्षेत्र लगातार तकनीकी, कारोबारी और विधायी सुधारों की माँग कर रहा था। इसी दिशा में मर्चेंट शिपिंग बिल 2025 (वाणिज्य पोत परिवहन विधेयक, 2025) हाल ही में संसद के दोनों सदनों से पारित हुआ, जिसने “मर्चेंट शिपिंग एक्ट 1958” जैसे दशकों पुराने विधायी ढांचे को प्रतिस्थापित कर दिया। इस रिपोर्ट में इस बिल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, विधेयक के प्रमुख प्रावधान, कानूनी और आर्थिक प्रभाव, अंतरराष्ट्रीय मेलबंदी, पर्यावरणीय एवं सामाजिक सरोकार, भारतीय समुद्री व्यापार एवं टनेज प्रोत्साहन, तथा भविष्यगत दिशा—इन सभी पहलुओं का स्तरीय विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। रिपोर्ट में संसद में हुई बहस, विपक्षी दृष्टिकोण, संशोधन प्रस्तावों और विभिन्न पक्षधारकों (stakeholders) के विचारों को भी सम्मिलित किया गया है, जिससे यह अध्ययन समग्र और संदर्भयुक्त बनता है।

1. ऐतिहासिक संदर्भ: भारत में समुद्री कानूनों का विकास

1.1 औपनिवेशिक युग और स्वतंत्रता पश्चात्

भारत में समुद्री कानूनों की नींव औपनिवेशिक काल में रखी गई थी, जिसमें ब्रिटेन के “Merchant Shipping Act 1894” और 1923 का “Indian Merchant Shipping Act” मुख्य स्रोत थे। स्वतंत्रता के बाद बदलती वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए 1958 में भारतीय संसद ने “Merchant Shipping Act 1958” पारित किया, जो भारत के जलक्षेत्र, जहाजों की रजिस्ट्री, स्वामित्व, सुरक्षा, पर्यावरण, नाविकों के कल्याण इत्यादि को नियंत्रित करता था2।

पिछले कुछ दशकों में, भारत के समुद्री कारोबारी मॉडल, अंतरराष्ट्रीय मानकों और तकनीकी उन्नतियों में बड़ा बदलाव आया है। 1958 का कानून अपनी जटिलता और औपनिवेशिक मानसिकता के कारण समय के साथ अप्रासंगिक और बोझिल माना जाने लगा था। इसके विभिन्न हिस्से कई बार संशोधित भी हुए, फिर भी अधुनातन समुद्री व्यापार एवं सुरक्षा संबंधी अपेक्षाओं को विधिवत रूप से संबोधित नहीं कर पाते थे।

1.2 विधायी पुनरावलोकन और नए सुधार

1990 के दशक से प्रतिवर्ष विभिन्न समीक्षाएँ, संसद में ड्राफ्ट बिल और विशेषज्ञ समितियों की रिपोर्ट सामने आईं, जिसने 1958 के कानून की भारी-भरकम, अपूर्ण और खंडित संरचना की ओर ध्यान खींचा। इसमें अंतरराष्ट्रीय कानूनों (IMO conventions, SOLAS, MARPOL, MLC, आदि) के समेकन की आवश्यकता, भारतीय टनेज और जहाज रजिस्ट्रेशन की नीति, समुद्री सुरक्षा और आपदा प्रबंधन आदि प्रमुख बिंदु थे4।

2016 और 2020 में ड्राफ्ट बिल आए, लेकिन विभिन्न सामाजिक, तकनीकी और विधायी कारणों से कानून में पूरी तरह परिवर्तन नहीं हो सका। अंततः, 2025 की संसद ने नई आर्थिक और सुरक्षा आवश्यकताओं के अनुरूप मर्चेंट शिपिंग बिल 2025 को प्रस्तुत एवं पारित किया।


2. संसद में प्रस्तावना, बहस एवं पारण

2.1 लोकसभा, राज्यसभा और विपक्ष की भूमिका

मर्चेंट शिपिंग बिल को लोकसभा ने 6 अगस्त 2025 को ध्वनिमत से पारित किया, जबकि राज्यसभा में 11 अगस्त को बहस के दौरान विपक्ष के सांसद बिहार में मतदाता सूची (SIR) की समीक्षा पर चर्चा न होने देने के विरोध में वाकआउट कर गए और बिल बिना चर्चा के पारित हो गया। कुछ विपक्षी सदस्यों ने सांकेतिक संशोधन भी प्रस्तुत किए थे। सत्तारूढ़ पक्ष की ओर से श्री सर्बानंद सोनोवाल (केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्री) ने विधेयक के व्यापक, आधुनिक, और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (IMO, MARPOL) की आवश्यकताओं के अनुरूप होने को रेखांकित किया6।

बहस के सीमित अवसरों पर वाईएसआर कांग्रेस के प्रतिनिधि ने भी विधेयक के ऐतिहासिक महत्व, समुद्री व्यापार के वृद्धि में इसकी भूमिका तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धा की आवश्यकता को केंद्र में रखा, वहीं विपक्ष ने सदन में पर्याप्त चर्चा न होने, संशोधन पर विचार न करने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बाधा की बात कही6।

3. प्रमुख उद्देश्य और नवाचार

मर्चेंट शिपिंग बिल 2025 के मुख्य उद्देश्य और नवाचार निम्न रूप में प्रकट होते हैं:

  • कानूनी ढांचे का आधुनिकीकरण: पुराने 67 वर्ष पुराने कानून को हटाकर सरल, पारदर्शी, डिजिटल और लागू करने में आसान व्यवस्था स्थापित करना।
  • अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप परिपालन: भारत को IMO तथा अन्य वैश्विक सम्मेलनों के अनुरूप लाना, जिससे भारतीय जहाजों की विश्वसनीयता, सुरक्षा प्रमाणन और वैधानिक स्वीकार्यता बढ़े।
  • व्यापार में सरलता और नवाचार: लाइसेंसिंग, रजिस्ट्रेशन, विवाद निवारण, लॉजिस्टिक्स प्रक्रिया को डिजिटल बनाते हुए भ्रष्टाचार एवं देरी को खत्म करना।
  • नाविक अधिकार और कल्याण: नाविकों के कार्यस्थल सुरक्षा, अनुबंध, वेतन, स्वास्थ्य सुविधा, शिकायत निवारण - सभी के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था देना।
  • पर्यावरण संरक्षण: MARPOL व अन्य सम्मेलनों के प्रावधानों के अनुरूप हर जहाज के लिए प्रदूषण निवारण प्रमाणपत्र अनिवार्य करना, समुद्री कचरा प्रबंधन के सख्त नियम लागू करना।
  • भारतीय टनेज प्रोत्साहन और निवेश: घरेलू जहाजरानी कारोबार को प्रवर्तित करना, स्वामित्व की परिभाषा विस्तृत करना, भारतीय ध्वज के अंतर्गत जहाजों की संख्या बढ़ाना और विदेशी निवेश आकर्षित करना3।

4. मर्चेंट शिपिंग बिल 2025: प्रमुख प्रावधानों का सार

बिल के मुख्य प्रावधान, उद्देश्य, संभावित प्रभाव निम्नलिखित हैं :

o  जहाजों की परिभाषा का विस्तार

उद्देश्य- सभी श्रेणियों, जैसे मोबाइल ऑफशोर ड्रिलिंग यूनिट, पनडुब्बियाँ, नॉन-डिसप्लेसमेंट क्राफ्ट को समाविष्ट करना

संभावित प्रभाव- शिपिंग कारोबारी मॉडल अधिक व्यापक, टेक्नोलॉजी-संगत


o  स्वामित्व के मानदंड में ढील

उद्देश्य- OCI, कम्पनियाँ, आंशिक स्वामित्व को अनुमति

संभावित प्रभाव- विदेशी निवेश, भारतीय ध्वज वाले जहाजों में वृद्धि


o  शिप रीसायक्लिंग पंजीकरण

उद्देश्य- शिप-ब्रेकिंग के लिए अस्थायी पंजीकरण

संभावित प्रभाव- भारत (विशेषकर अलंग) शिप-रिसायक्लिंग के वैश्विक हब हेतु सुदृढ़ता


o  पर्यावरणीय अनुशासन

उद्देश्य- MARPOL/IMO के अनुरूप हर जहाज के लिए प्रदूषण प्रमाणपत्र अनिवार्य

संभावित प्रभाव- समुद्री प्रदूषण में कमी, अंतर्राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स में भरोसा


o  DG Marine Administration को शक्तियाँ

उद्देश्य- समुद्री शिक्षा, प्रशिक्षण, संस्थानों का परीक्षण एवं मान्यता

संभावित प्रभाव- नाविकों का वैश्विक कौशल, प्रशिक्षण मानक सुधार


o  आपराधिक प्रावधान / दंड

उद्देश्य- राष्ट्रीयता छुपाना, जरूरी लाइसेंस के बिना एजेंसी चलाना, प्रदूषण फैलाना आदि अपराध

संभावित प्रभाव- अनुपालन बाध्यता, पर्यावरण/सुरक्षा मानकों को मजबूती


o  लाइसेंसिंग एवं डिजिटल प्रोसेस

उद्देश्य- पंजीकरण, लाइसेंस ऑनलाइन, प्रमाणपत्र डिजिटल

संभावित प्रभाव- भ्रष्टाचार, देरी, नौकरशाही में कमी


o  नाविकों का सामाजिक सुरक्षा

उद्देश्य- केन्द्र सरकार द्वारा निर्धारित सामाजिक सुरक्षा

संभावित प्रभाव- नाविकों व श्रमिकों के कल्याण में सुधार


o  अनुशासन, शिक्षा एवं प्रशिक्षण

उद्देश्य- DG को प्रतिस्थापित कर “Director General Marine Administration” की स्थापना

संभावित प्रभाव- वैधानिक प्रवर्तन, गुणवत्ता स्कूलिंग एवं नाविक सुरक्षा


o  समुद्री दुर्घटना जांच

उद्देश्य- दुर्घटनाओं की जाँच, पूछताछ व्यवस्था, जिम्मेदारी निर्धारण

संभावित प्रभाव- दुर्घटना रोकथाम, जवाबदेही की पारदर्शिता


प्रत्येक उपर्युक्त प्रावधान भारतीय समुद्री कारोबार, लॉजिस्टिक्स, निवेश और सुरक्षा-आधारित ढांचे को न केवल मजबूत करता है, बल्कि भारत की ‘ब्लू इकोनॉमी’ में दीर्घकालीन संभावनाएँ खोलता है|9


5. कानूनी ढांचा: अनुपालन, प्रशासन एवं विवाद निपटान

5.1 नूतन विधायी संरचना

बिल ने 16 भाग और 325 धाराओं में विभाजित संरचना प्रस्तुत की है (पहले 1958 कानून में 561 धाराएँ थीं)। यह संक्षिप्तता, स्पष्टता और अनुपालन की दृष्टि से अत्यंत लाभकारी सिद्ध होती है। इसके तहत—

  • Director General Marine Administration की संस्था, जो भारत के समुद्री क्षेत्र का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी है।
  • रजिस्ट्रेशन और लाइसेंसिंग रजिस्ट्रार द्वारा नियंत्रित, पूरी तरह डिजिटल व सुरक्षात्मक।
  • अनुबंध, विवाद, वेतन, अनुशासन, सामाजिक सुरक्षा आदि मामलों के लिए स्पष्ट विधायी आधार।
  • विशेष रूप से नाविकों के लिए करार, शिकायत निवारण पोर्टल, स्वास्थ्य सुविधा, और सामाजिक सुरक्षा का कानूनी संरक्षण।
  • पर्यावरणीय अपराध की स्थिति में कड़ी सजा और नागरिक दंड का प्रावधान।

5.2 अनुपालन व्यवस्था और व्यापारिक सुधार

नवीन विधेयक से “Ease of Doing Business” (कारोबार में सुगमता) को कानूनी आधार मिलता है। पुराने फॉर्म भरने, अनुमतियाँ लेने की जटिलता, भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी में भारी गिरावट अपेक्षित है। डॉक्यूमेंटेशन, ट्रांजैक्शन, लाइसेंस, विवादित भुगतान, बीमा—इन सभी में पारदर्शिता और डिजिटल प्रक्रिया की गारंटी मिलती है12।

5.3 दुर्घटना जांच प्रावधान

कोई भी समुद्री दुर्घटना अब प्राधिकृत संस्थान/अधिकारी के जांच-अधिकार में आएगी। दुर्घटनाओं के कारण, जिम्मेदारी, व्यवसायिक नुकसान, बीमा भुगतान, श्रमशक्ति के मसले आदि के समाधान हेतु जल्दी, डिजिटल व पारदर्शी व्यवस्था लागू होगी। इससे समुद्री पर्यावरण सुरक्षा और नाविकों के जीवन की गारंटी भी बेहतर ढंग से सुनिश्चित की जा सकती है8।

6. व्यावसायिक और आर्थिक पहलू

6.1 भारतीय पोत टनेज और निवेश प्रोत्साहन

अन्य प्रमुख देशों (सिंगापुर, चीन, UAE) की तरह भारत अपने जहाजों के टनेज को बढ़ाकर वैश्विक पोत-निर्यात में हिस्सेदारी मजबूत करना चाहता है। भारतीय ध्वज के अंतर्गत जहाजों की संख्या बढ़ाने के लिए विदेशी निवेश, OCI स्वामित्व, “फ्लैग ऑफ कन्विनियंस” जैसी व्यवस्थाओं का नियमन लचीला किया गया है। इससे शिपिंग कंपनियाँ अलंग, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता जैसे इंडियन पोर्ट्स पर अधिक जहाज रजिस्टर कर सकेंगी, जिससे रोजगार, आयात-निर्यात, लाइसेंसिंग चार्ज, मेन्टेनेन्स सुविधा, शिप रिसायक्लिंग—हर क्षेत्र में घरेलू कारोबार और सरकारी राजस्व बढ़ेगा14

6.2 टनेज कर (Tonnage Tax Scheme): वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता

भारत में जहाज कंपनियों की प्रतिस्पर्धा को “टनेज कर योजना” के तहत सहूलियत देना उल्लेखनीय है। इस नीति के अनुसार कंपनियों को उनके वास्तविक मुनाफे के बजाय जहाजों के वज़न (टन में) के आधार पर कर देना होता है, जिससे कर अनुपालन का बोझ कम होता है और कंपनियाँ इन्फ्रास्ट्रक्चर पर निवेश के लिए प्रोत्साहित होती हैं। यह व्यवस्था ब्रिटेन, सिंगापुर, जापान आदि द्वारा अपनाई गई समान अंतरराष्ट्रीय प्रथाओं के अनुरूप है15।

6.3 बंदरगाह और तटीय व्यापार

नवीन कानूनों के समेकित प्रभाव से भारतीय बंदरगाहों की माल हैंडलिंग और लॉजिस्टिक्स दक्षता में भारी सुधार आयेगा। सागरमाला, पोर्ट आधुनिकीकरण जैसी सरकारी पहलों से इन्हें उच्चस्तरीय वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं:

  • टर्नअराउंड टाइम में कमी
  • कंटेनर ड्वेल टाइम में कमी
  • बंदरगाह डिजिटलाइजेशन, पारदर्शिता, स्थानीय विवाद त्वरित समाधान

इससे न केवल कांसाइनर और कारोबारी लाभान्वित होंगे, बल्कि बंदरगाह आधारित रोजगार, तटीय राज्यों की अर्थव्यवस्था, और GDP वृद्धि को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा16।

7. अंतरराष्ट्रीय मानकों एवं तुलना

7.1 IMO, SOLAS, MARPOL आदि के साथ नयापन

भारतीय मर्चेंट शिपिंग बिल 2025 में International Maritime Organization (IMO), Safety of Life at Sea (SOLAS), Marine Pollution (MARPOL), Maritime Labour Convention (MLC) जैसे प्रमुख शोध-आधारित और प्रतिपादित मानकों को फॉलो अप किया गया है। अनिवार्य प्रदूषण नियंत्रण, जीवन सुरक्षा, दुर्घटना जांच, शिप-रिसायक्लिंग, सुरक्षा प्रमाणन इत्यादि में वैश्विक दिशानिर्देश लागू किए गए हैं।

इससे भारतीय जहाज, पोर्ट और नाविकों की अंतरराष्ट्रीय पहचान, बीमा-मूल्यांकन, रजिस्ट्रेशन, सेफ्टी ऑडिट आदि आसान होंगे। विश्व बैंक के लॉजिस्टिक्स प्रदर्शन सूचकांक, ग्लोबल पोर्ट्स कंसोर्टियम आदि में भारत की रैंक और सुधार के लिए नए अवसर खुले हैं।

7.2 प्रमुख देशों (सिंगापुर, यूएई, ब्रिटेन) के मॉडल की तुलना

अंतरराष्ट्रीय अनुभव का सारांश है—

  • ब्रिटेन: टनेज कर और 'ओपन रजिस्टर' नीति अपनाकर जहाज रजिस्ट्रेशन में सरलता और प्रतिस्पर्धा।
  • सिंगापुर: Tonnage Incentives और पोर्ट डिजिटलाइजेशन से भारतीय व्यापार मॉडल के नए अवसर।
  • UAE: अंतरराष्ट्रीय धनराशि समर्थित पोर्ट, विदेशी निवेश, फ्री ट्रेड पॉलिसी।

मर्चेंट शिपिंग बिल 2025 इन्हीं नीतियों से प्रेरित, किन्तु भारतीय सन्दर्भ के अनुरूप सुधारक है—जहाँ कारोबार में सरलता के साथ श्रमिक अधिकार, पर्यावरण सुरक्षा आदि की सुरक्षा की गई है।

8. समुद्री प्रदूषण और पर्यावरण सुरक्षा

8.1 MARPOL अनुरूपता

समुद्री प्रदूषण रोकने के लिए “प्रदूषण निवारण प्रमाणपत्र” (Pollution Prevention Certificate) का हर जहाज के लिए अनिवार्य प्रावधान, MARPOL कन्वेंशन के अनुरूप है। यह प्रावधान, सिर्फ बड़े टन भार के जहाजों पर नहीं, बल्कि सभी किस्म के व्यावसायिक जहाजों पर लागू होगा। अपंजीकृत या प्रदूषण प्रमाणपत्र के बिना स्थिति में नागरिक या आपराधिक दंड का प्रावधान है10।

जलवायु परिवर्तन और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को देखते हुए “ग्रीन पोर्ट”, “हरित समुद्री पहल”, तथा “क्लीन अप प्रोजेक्ट्स” को कानूनी बल प्राप्त हुआ है।

8.2 शिप रीसायक्लिंग, मलबा हटाने और दुर्घटनाओं का प्रबंधन

बिल में शिप रिसायक्लिंग के लिए अस्थायी पंजीकरण, मलबा हटाने के अधिकार और त्वरित बचाव जैसी व्यवस्थाएँ हैं। गुजरात के “अलंग शिप ब्रेकिंग यार्ड” जैसे केंद्रों में अंतरराष्ट्रीय निवेश का रास्ता खुलता है, जिससे भारत इस क्षेत्र में वैश्विक केंद्र बनता जा रहा है।

9. नाविकों के अधिकार व कल्याण

9.1 सामाजिक सुरक्षा, अनुबंध और विवाद समाधान

मर्चेंट शिपिंग बिल 2025 नाविकों (seafarers) व अन्य श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा, अनुबंध (करार), वेतन भुगतान, कार्य-घंटों की स्पष्टता, स्वास्थ्य एवं शिकायत निवारण की विधेयक बनाता है। केंद्र सरकार को व्यापक अधिकार हैं कि वह नाविकों के लिए ‘समाज कल्याण सामान्य’ सुरक्षा देने वाली सामाजिक योजनाएँ बनाए12।

9.2 प्रशिक्षण व वैश्विक स्तर की शिक्षा

DG Marine Administration को प्रशिक्षण, शिक्षा प्रोग्राम, पाठ्यक्रम निर्माण, संस्थानों की मान्यता की सभी शक्तियाँ दी गई हैं, जिससे आगामी वर्षों में भारतीय नाविक वैश्विक मानकों के अनुरूप होंगे। भारत पहले से ही 12% वैश्विक नाविक श्रमशक्ति का आपूर्तिकर्ता है, लक्ष्य इसे 20% तक बढ़ाना है।

10. टनेज, निवेश, निर्यात एवं ब्लू इकोनॉमी

10.1 ‘ब्लू इकोनॉमी’ का उभार

नवीन विधायी सुधारों से भारत की ‘ब्लू इकोनॉमी’—अर्थात समुद्र आधारित उद्योग, पोर्ट, टनेज, समुद्री पर्यटन, मत्स्य पालन, शिपब्रेकिंग आदि—को नई गति मिलेगी। भारत का लक्ष्य 2030 तक ‘230 मिलियन मीट्रिक टन’ तटीय कार्गो को संभालना और प्रमुख पोर्ट्स की क्षमता लगभग दोगुनी करना है16।

10.2 निर्यात प्रोत्साहन

सरकार की नीतियाँ—डीईपीबी, एसईआईएस, देय शुल्क वापसी, ब्याज समतुल्यीकरण, RoDTEP आदि—भारतीय निर्यातकों और व्यापारिक सशक्तिकरण हेतु विविध छूट, सब्सिडी, ऋण, कर प्रोत्साहन का प्रावधान देती हैं, जिससे ‘मेक इन इंडिया’ के तहत घरेलू उत्पाद वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनें।

11. संसद में चर्चा, पक्ष-विपक्ष व संशोधन

11.1 बहस, संशोधन और राजनैतिक विमर्श

इस विधेयक को त्वरित पारित किया गया और सम्यक चर्चा/संशोधन की अनुपस्थिति पर विपक्ष ने नाराजगी जताई। उनके अनुसार जहाज स्वामित्व प्रावधानों में पर्याप्त सुरक्षा, प्रांतीय राज्य हित, पर्यावरणीय निगरानी, नाविक कल्याण में व्यावहारिक चिंताओं की ओर और अधिक संवेदनशीलता अपेक्षित थी। फिर भी, सत्तापक्ष ने विधेयक की आधुनिक, प्रतिस्पर्धी और विश्वसनीय व्याख्या को प्रमुखता दी, और इसे आत्मनिर्भर (Aatmanirbhar), आत्मविश्वासी समुद्री राष्ट्र का मार्ग बताया5।

11.2 संशोधन प्रस्ताव व प्रमुख मुद्दे

जहाजों की परिभाषा, लाइसेंसिंग से जुड़े विवाद, शिप रिसायक्लिंग वाच-डॉग, पर्यावरण दंड, नाविकों के अनुबंध विवाद व अशक्त नाविक श्रमिकों हेतु त्वरित मुआवजा के तंत्र को और भी मजबूत करने के लिए संशोधन पेश हुए, किन्तु पारित नहीं हो पाए।

12. अंतरराष्ट्रीय/आर्थिक दस्तावेज, रिपोर्ट एवं नीति सहारा

  • Drishti IAS, PRS Legislative, PIB releases, News18, etvbharat, DD News, News On AIR, BharatSamachar, UPSC reports, Shiprocket, MarineGyaan, Shipmin.gov.in, Testbook आदि द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट/ड्राफ्ट/पॉलिसी डॉक्यूमेंट से प्रत्यक्ष रूप से सूचनाएँ, साक्ष्य और विश्लेषण अंतःस्थापित हैं।
  • “SAGARMALA”, “Maritime India Vision 2030”, “LPPI 2023-24”, “Green Port & Shipping”, “Digital Port System” जैसे मिशन संबंधी पहल और रिपोर्ट को भी नोट किया गया है।

13. प्रमुख पक्षधारकों (Stakeholders) और संभावित प्रभाव

13.1 शिप ओनर्स, निवेशक, निर्यातक

  • विदेशी और घरेलू स्वामित्व के व्यापक मानदंड, लाइसेंस/रजिस्ट्रेशन की पारदर्शिता, व्यावसायिक सुविधा, बीमा विवाद समाधान, मुआवजा व अनुबंध विवाद निपटान।

13.2 नाविक व श्रमिक संगठन

  • सामाजिक सुरक्षा, प्रशिक्षण, बीमा, वेतन एवं कार्य संकट निवारण हेतु पोर्टल-प्लेटफार्म, सुरक्षा स्पष्टता, शिकायत निवारण, श्रमिक अधिकार।

13.3 बंदरगाह राज्य सरकारें

  • छोटे बंदरगाह प्रबंधन, उपयोग फीस, विवाद समाधान का क्षेत्रीय अधिकार, इन्फ्रास्ट्रक्चर-अपग्रेडेशन, निवेश का प्रवाह।

13.4 पर्यावरणविद, सिविल सोसाइटी

  • प्रदूषण नियंत्रण, MARPOL और IMO प्रावधान की बाध्यता, तटीय राज्यों के लिए हरित समुद्री पहल, सतत विकास।

13.5 इंडस्ट्री, लॉजिस्टिक्स व बीमा कंपनियाँ

  • व्यवसायिक जोखिम, डिजिटल डॉक्यूमेंटेशन, दुर्घटना/क्षति समाधान, वैश्विक बीमा मानक, आसान प्रीमियम।

13.6 नीति निर्माता, अंतर्राष्ट्रीय संगठन

  • भारत की बढ़ती वैश्विक उपस्थिति, क्वालिटी-इंडिकेटर्स, लॉजिस्टिक्स परफॉर्मेन्स इंडेक्स, राजनीतिक-आर्थिक सुदृढ़ता।

14. भविष्यगत दृष्टिकोण, संभावनाएँ और चुनौतियाँ

14.1 सकारात्मक दिशा

  • भारतीय समुद्री उद्योग वैश्विक नेता बनने की दिशा में: अधिक निवेश, आधुनिक बंदरगाह, डिजिटल डॉक्यूमेंटेशन, हरित तकनीक के कारण भारत सिंगापुर, चीन, UAE, ब्रिटेन जैसे देशों की प्रतिस्पर्धा में मजबूती से उतरेगा।
  • नवाचार, योग्यता, और रोजगार: नाविकों के लिए वैश्विक स्तर की शिक्षा-प्रशिक्षण, किनारों पर हरित उद्योग, गिरते ट्रांजिट टाइम, बढ़ती नौकरियाँ।ब्लू इकोनॉमी का विस्तार: 2030 तक टनेज, लॉजिस्टिक्स, पोर्ट, टूरिज्म, मत्स्य पालन और शिप-रिसायक्लिंग से भारी वृद्धि के संकेत।
  • पर्यावरण, डिजिटल गवर्नेंस: प्रदूषण नियंत्रण, पोर्ट ग्रीन इनिशिएटिव्स, डिजिटल पोर्टल्स और शिकायत निवारण का प्रभावी कार्यान्वयन।

14.2 संभावित चुनौतियाँ

  • राज्य-केंद्र समन्वय: बंदरगाह अधिकार, स्थानीय विवाद, ट्रेड यूनियनों की माँग और नीतिगत समन्वय।
  • लागू करने की जमीनी चुनौतियाँ: तटीय राज्य, फंडिंग, पात्र लाभार्थी के डेटा संग्रह, समुद्री अपराध रोकथाम, पर्यावरणीय अंकेक्षण।
  • नवाचारों पर निर्भरता: शिपिंग कंपनियों के लिए नए प्रावधानों का बारीकी से अनुपालन, ट्रेनिंग, सोशल सिक्योरिटी स्कीम्स की डीप निगरानी।

15. निष्कर्ष

मर्चेंट शिपिंग बिल 2025 भारतीय समुद्री क्षेत्र के लिए एक युगांतकारी, समसामयिक और भविष्योन्मुखी कानूनी क्रांति है। यह सिर्फ 67 साल पुराने एक भारी-भरकम कानून को प्रतिस्थापित करके कारोबारी सरलता, वैश्विक प्रतिस्पर्धा, पर्यावरणीय जिम्मेदारी और सामाजिक सुरक्षा का नया युग प्रारंभ करता है। भारत की समुद्री शक्ति, तकनीकी नवाचार, पोर्ट प्रबंधन, वैश्विक निवेश और ब्लू इकोनॉमी के दौर में यह कानून निर्णायक भूमिका अदा करेगा।

इस विधेयक से—सरलीकृत कानूनी ढांचा, तत्काल परेशानी का समाधान, व्यवसाय में बदलाव, पर्यावरण का संरक्षण, सामाजिक न्याय और नीति की पारदर्शिता—ये सभी भारतीय समुद्री क्षेत्र को 21वीं सदी के अनुरूप वैश्विक शक्ति के रूप में उभारने वाले स्तम्भ सिद्ध होंगे।

संक्षिप्त प्रमुख बिंदु:

  • ऐतिहासिक विरासत से आद्यतन, प्रासंगिक कानून का निर्माण।
  • पारदर्शी, डिजिटल और समावेशी कारोबारी माहौल।
  • पर्यावरणीय सुरक्षा, नाविक कल्याण एवं सामाजिक अंतर्राष्ट्रीय जिम्मेदारी।
  • टनेज कर-प्रोत्साहन, निर्यात-नवाचार, और सशक्त ब्लू इकोनॉमी।

अंततः, मर्चेंट शिपिंग बिल 2025 भारत में व्यापार, सुरक्षा, नवाचार और विश्वसनीयता का नया युग प्रारंभ करता है, जिसकी मिसाल भविष्य के वैश्विक समुद्री विधायी परिवर्तनों में भी दी जाएगी।




References


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